लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
चंद्रशेखर आजाद को 2027 में मिलेगी केतली? बिहार के बाद यूपी में भी चुनाव चिह्न पर सस्पेंस
नई दिल्ली/लखनऊ । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी बीच आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद के सामने चुनावी पहचान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हो गया है। सवाल है उनकी पार्टी के चुनाव चिह्न ‘केतली’ का। बिहार विधानसभा चुनाव में केतली चुनाव चिह्न नहीं मिलने के बाद अब उत्तर प्रदेश में भी इस चुनाव चिह्न को लेकर स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार है। 2 नवंबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के लिए पार्टी को केतली चुनाव चिह्न आवंटित किए जाने का कोई अंतिम आदेश सामने नहीं आया है।
चंद्रशेखर आजाद पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक और संगठनात्मक गतिविधियां तेज कर रहे हैं। प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में सभाओं और कार्यकर्ता सम्मेलनों के जरिए पार्टी का जनाधार बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में चुनाव चिह्न का सवाल पार्टी की आगामी रणनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो गया है।
बिहार में केतली नहीं मिलने से शुरू हुआ विवाद
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के लिए केतली चुनाव चिह्न केवल एक निशान नहीं, बल्कि उसकी चुनावी पहचान का हिस्सा रहा है। वर्ष 2021 में उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान पार्टी को केतली चुनाव चिह्न मिला था। बाद के चुनावों में भी इस निशान के साथ पार्टी की पहचान बनी रही।
लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पार्टी को केतली चुनाव चिह्न नहीं मिला। इस मुद्दे पर 16 अक्टूबर 2025 को मेरठ में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान चंद्रशेखर आजाद ने नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा था कि चुनाव आयोग की ओर से उन्हें तकनीकी कारण बताया गया है। उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि जरूरी नहीं कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी पार्टी का चुनाव चिह्न केतली ही रहे।
चंद्रशेखर आजाद का यह बयान बताता है कि केतली चुनाव चिह्न को लेकर अनिश्चितता का मुद्दा पार्टी के भीतर और उसके राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर पहले से मौजूद है। हालांकि बिहार में पार्टी को चुनावी सफलता नहीं मिलने का एकमात्र कारण चुनाव चिह्न को बताना सही नहीं होगा। इसके लिए उम्मीदवारों, संगठन, गठबंधन और चुनाव परिणामों का अलग-अलग विश्लेषण जरूरी है।
चंद्रशेखर आजाद के लिए क्यों अहम है केतली का निशान?
चंद्रशेखर आजाद ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की नगीना सीट से आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की थी। उन्होंने भाजपा के ओम कुमार को 1 लाख 51 हजार 473 वोटों से हराया था। इस जीत के बाद वे लोकसभा पहुंचने वाले अपनी पार्टी के प्रमुख चेहरे बने।
ऐसे में पार्टी के सामने अब 2027 के विधानसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक उपस्थिति को विस्तार देने की चुनौती है। चुनाव चिह्न इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मतदाता के लिए चुनाव चिह्न प्रत्याशी और राजनीतिक दल की पहचान का सरल माध्यम होता है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और उन मतदाताओं के बीच, जो पार्टी के नाम या प्रत्याशी के बजाय चुनाव चिह्न से अपनी पसंद पहचानते हैं।
यदि पार्टी को पहले से प्रचलित केतली के बजाय कोई दूसरा चुनाव चिह्न मिलता है तो उसे नए निशान की पहचान मतदाताओं तक पहुंचाने के लिए अतिरिक्त प्रचार करना पड़ सकता है। हालांकि इससे पार्टी को कितना चुनावी नुकसान होगा, इसका आकलन अभी नहीं किया जा सकता।
क्या कहता है चुनाव आयोग का नियम?
चुनाव चिह्न आवंटन की व्यवस्था निर्वाचन आयोग के चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के तहत संचालित होती है। इसमें राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लिए आरक्षित चुनाव चिह्न की व्यवस्था है। वहीं पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल निर्धारित शर्तें पूरी करने पर किसी चुनाव में साझा चुनाव चिह्न आवंटित कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
इसके लिए चुनाव आयोग के समक्ष निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होती है। पार्टी को चुनाव लड़ने की मंशा, उम्मीदवारों की संख्या और चुनाव चिह्न संबंधी जरूरी औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं। साझा चुनाव चिह्न का आवंटन स्वतः नहीं होता और एक राज्य में मिला चुनाव चिह्न दूसरे राज्य के चुनाव में अपने आप मिलने की गारंटी भी नहीं देता।
इसलिए बिहार में केतली नहीं मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उत्तर प्रदेश में भी पार्टी को यह चिह्न नहीं मिलेगा। अंतिम निर्णय चुनाव आयोग के नियमों और संबंधित चुनाव के लिए की जाने वाली आवंटन प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
राजस्थान में भी केतली से जुड़ी रही पार्टी की पहचान
राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 में भी आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) चुनाव मैदान में उतरी थी। निर्वाचन आयोग की चुनावी रिपोर्ट में पार्टी को पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल के रूप में दर्ज किया गया है। पार्टी की चुनावी गतिविधियों में केतली चिह्न की पहचान भी सामने आई थी।
यह तथ्य बताता है कि पार्टी अलग-अलग राज्यों में अपनी चुनावी पहचान स्थापित करने की कोशिश करती रही है। लेकिन प्रत्येक राज्य के चुनाव में साझा चुनाव चिह्न का आवंटन अलग प्रक्रिया के तहत होता है।
2027 से पहले चुनाव चिह्न पर नजरें
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर 2027 में होने वाला चुनाव आजाद समाज पार्टी के लिए संगठन और राजनीतिक विस्तार की महत्वपूर्ण परीक्षा होगा। चंद्रशेखर आजाद के सामने पार्टी को प्रदेशव्यापी स्तर पर मजबूत करने, उम्मीदवारों का चयन करने और मतदाताओं तक अपनी राजनीतिक पहचान पहुंचाने की चुनौती है।
ऐसे में केतली चुनाव चिह्न को लेकर स्पष्टता पार्टी की चुनावी तैयारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। पार्टी को वही चुनाव चिह्न मिलेगा या कोई दूसरा निशान आवंटित होगा, इसका फैसला चुनाव आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।
फिलहाल इस मामले में न तो चुनाव आयोग की ओर से आजाद समाज पार्टी का केतली चिह्न प्रतिबंधित किए जाने का कोई आदेश सामने आया है और न ही उत्तर प्रदेश के लिए इसे अंतिम रूप से आवंटित किए जाने की पुष्टि हुई है।
चंद्रशेखर आजाद और उनके समर्थकों के लिए यह मामला केवल एक चुनाव चिह्न का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक पहचान का भी है जिसे पार्टी पिछले कुछ वर्षों से स्थापित करने में जुटी है। अब निगाहें चुनाव आयोग के अगले फैसले पर रहेंगी।
