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अंता उपचुनाव: कांग्रेस, बीजेपी और निर्दलीय में त्रिकोणीय मुकाबला, बड़े नेता प्रचार से दूर!

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लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
अंता उपचुनाव:  में त्रिकोणीय मुकाबला, स्थानीय समीकरण बने चुनौती
नीरज मेहरा वरिष्ठ

उम्मीदवार अपने दम पर डटे है प्रचार प्रसार में

अंता विधानसभा उपचुनाव की तस्वीर अब लगभग साफ हो चुकी है। मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया, भारतीय जनता पार्टी के मोरपाल सुमन, और निर्दलीय नरेश मीणा के बीच त्रिकोणीय बनता दिखाई दे रहा है।
हालांकि, कई निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में हैं, लेकिन मुकाबले की असली लड़ाई इन्हीं तीन के बीच मानी जा रही है।
जातीय समीकरण की बिसात
अंता क्षेत्र में करीब 60,000 अनुसूचित जाति (SC) मतदाता हैं, जो यहां के चुनावी गणित में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। पारंपरिक रूप से यह वर्ग कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता रहा है, लेकिन इस बार समीकरण कुछ अलग दिख रहे हैं।
पूर्व विधायक रामलाल मेघवाल और अन्य अनुसूचित जाति वर्ग के प्रत्याशी कांग्रेस के वोटों में सेंध लगा सकते हैं।
वहीं, नरेश मीणा भी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाते दिख रहे हैं, क्योंकि मीणा समाज के वोटों का बड़ा हिस्सा उनके खाते में जाने की संभावना है।
भाजपा की रणनीति और सुमन की उम्मीदें
भाजपा उम्मीदवार मोरपाल सुमन, माली समाज से आते हैं। उन्हें पार्टी के परंपरागत वोट बैंक के साथ-साथ माली समाज का भी व्यापक समर्थन मिलने की उम्मीद है।
हालांकि नामांकन के बाद भाजपा के बड़े नेता अब तक अंता में सक्रिय नहीं हुए हैं। कहा जा रहा है कि यह सीट पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रभाव क्षेत्र में आती है और टिकट भी उनके सुझाव पर दिया गया है। संभव है कि पार्टी नेतृत्व ने चुनाव प्रबंधन पूरी तरह उन्हीं पर छोड़ रखा है।
कांग्रेस के लिए चुनौती
कांग्रेस उम्मीदवार प्रमोद जैन भाया सामान्य वर्ग से है जैन समुदाय आते हैं लेकिन सामान्य वर्ग में अधिक ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय ,वर्ग का झुकाव भारतीय जनता पार्टी की तरफ रहने के चलते प्रमोद जैन भैया अपनी तरफ इस वोट बैंक में कितनी सेंध मारी करते हैं ,यह आने वाले समय बताएगा।  फिलहाल तो वह   अपने मंत्री कार्यकाल में कराए गए विकास  विकास कार्यों  ,गरीबों और सामाजिक सरोकारों से जुड़े उनके प्रयासों दम पर चुनाव मैदान पर है उन्हें भरोसा के उनके द्वारा कराए गए कार्य और जनहित के मुद्दों के आधार पर जनता उनको वोट देगी।
लेकिन मैदान में उतर चुके अन्य SC और निर्दलीय प्रत्याशी कांग्रेस के पारंपरिक वोटों में सेंधमारी करेंगे ।
नामांकन के समय अशोक गहलोत, सचिन पायलट और गोविंद सिंह डोटासरा भले ही मौजूद रहे हों, लेकिन इसके बाद से कोई बड़ा नेता प्रचार में नहीं आया।
भाया अब तक पूरी तरह अपने दम पर चुनाव अभियान चला रहे हैं।
नरेश मीणा का आक्रामक चेहरा
निर्दलीय प्रत्याशी नरेश मीणा आक्रामक छवि और जुझारू स्वभाव के चलते चर्चा में हैं।
उन्हें पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा का समर्थन प्राप्त है, हालांकि गुढ़ा का यहां कोई खास वोट बैंक नहीं माना जाता।इसके बावजूद मीणा समाज और अनुसूचित जाति वर्ग के कुछ हिस्सों में उनकी पकड़ मजबूत बताई जा रही है।
नेता गायब, मैदान में सिर्फ उम्मीदवार
इस उपचुनाव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर बड़े नेताओं की सक्रियता लगभग नगण्य है।
कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही पार्टियों ने इस चुनाव को “लोकल लेवल” पर छोड़ दिया है।
ऐसा लगता है कि शीर्ष नेतृत्व ने उम्मीदवारों को फ्री हैंड दे रखा है —
जो जीते, वह पार्टी का प्रतिनिधि होगा, और जो हारे, वह अपनी जिम्मेदारी समझे।
अब तक के संकेत बताते हैं कि यह मुकाबला जातीय समीकरण और व्यक्तिगत छवि पर टिका हुआ है। हालांकि परंपरागत रूप से उपचुनाव सरकार के पक्ष में जाते हैं, परंतु अंता का यह चुनाव नतीजों के लिहाज से अप्रत्याशित हो सकता है।
कुल मिलाकर, अंता का चुनाव इस बार नेताओं का नहीं, बल्कि स्थानीय जनता और उम्मीदवारों का चुनाव बन चुका है। हो सकता है 1 नवंबर के बाद में प्रदेश के बड़े नेता इन चुनाव में सक्रिय भागीदारी निभाएं और आक्रामक रोग अपने फिलहाल तो यह चुनाव उम्मीदवारों के भरोसे ही टिका हुआ है उम्मीदवार अपनी-अपने छवि के आधार पर जनता के बीच जाकर वोटो की अपील कर रहे हैं और जनता जनार्दन सबके मजे ले रही है।

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