लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
अहसास की कलम से ……
अंता उपचुनाव ने सत्ता के माथे पर ऐसा आईना चिपका दिया है, जिसे हटाने की अब कोई पॉलीटिक्स-स्प्रे भी काम नहीं आ रहा।
दो साल का हक़ूमती रिपोर्ट कार्ड जनता ने एक झटके में फाड़कर हवा में उड़ा दिया—और जवाब साफ़ था:
“काम कम, दावे ज़्यादा… और अंदर खाने की लड़ाइयाँ उससे भी ज़्यादा।”
भीतरघात से बनी सरकार, भीतरघात से ही घायल
जो लोग महीनों से मंचों पर चिल्ला-चिल्ला कर कहते फिर रहे थे कि “कांग्रेस में आपसी फूट है, आपसी बैर है”,
आज वही चेहरे अंता की गलियों में टोपी नीचे खींचकर और मफ़लर आधा चेहरा ढककर घूमते दिखे।
जैसे जनता ने वोट नहीं दिया,
बल्कि उनकी पोल खोलती चार्जशीट दे दी हो।
सरकार के भीतर जो “हम एक हैं” का नारा था,
वो अंता का नतीजा लगते ही “हम एक-दूसरे के खिलाफ हैं” की असलियत में बदल गया।
नेताओं के बीच तालमेल इतना गड़बड़ कि लगता था जैसे
कोई ऑर्केस्ट्रा बिना कंडक्टर के बज रहा हो—
ढोलक हर दिशा में, और सुर कहीं भी नहीं।
नरेश मीणा – अकेला चला, काफ़िला बन गया
निर्दलीय नरेश मीणा ने साबित कर दिया कि
टिकट की ताकत से ज़्यादा जनता के दर्द की आवाज़ में दम होता है।
किसी भी स्थान पर रहे, पर असर ऐसा छोड़ा कि
सत्ता को साफ़ संदेश मिल गया—
“सड़क पर लड़ने वालों को जनता भूले नहीं,
कुर्सी पर बैठकर सोने वालों को माफ़ नहीं।”
उन्होंने चुनाव सिर्फ़ लड़ा नहीं,
सत्ता को जता दिया कि
वोटर आज मोबाइल नेटवर्क से भी तेज़
“कौन साथ है, कौन सिर्फ़ दिखावे में”— पहचान लेता है।
