लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
अंजू धानका: बस्सी की सियासत में महिला चेहरे का उभार, दो बार निर्दलीय विधायक बनने की कहानी
राजनीतिक दलों के गढ़ में निर्दलीय जीत का परचम, अंजू धानका कैसे बनीं बस्सी की विधायक?
जयपुर। राजस्थान की राजनीति में कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो किसी बड़े राजनीतिक परिवार, मजबूत संगठन या सत्ता के सहारे नहीं, बल्कि चुनावी मैदान में जनता के समर्थन से अपनी पहचान बनाती हैं। बस्सी विधानसभा क्षेत्र की अंजू देवी धानका की राजनीतिक कहानी भी ऐसी ही है। 2008 में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर बस्सी से जीत दर्ज की और पांच साल बाद 2013 में एक बार फिर चुनाव मैदान में उतरकर विधानसभा पहुंचीं। खास बात यह रही कि दोनों बार उन्होंने किसी बड़े राष्ट्रीय दल के टिकट पर नहीं, बल्कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की।
अंजू धानका की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बस्सी की राजनीति लंबे समय तक बीजेपी और कांग्रेस के बीच घूमती रही, लेकिन 2008 के बाद इस सीट पर लगातार दो चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। 2008 और 2013 में यह सिलसिला अंजू धानका के नाम रहा।
लेकिन आखिर ऐसा क्या था कि एक महिला निर्दलीय प्रत्याशी ने स्थापित राजनीतिक दलों को पीछे छोड़ते हुए बस्सी जैसी आरक्षित विधानसभा सीट पर लगातार दो बार जीत दर्ज कर ली?
यही है अंजू धानका की राजनीतिक कहानी।

दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई, फिर बस्सी की राजनीति में पहचान
अंजू देवी धानका के चुनावी हलफनामे के मुताबिक वे स्नातक हैं। उन्होंने नेशनल ओपन स्कूल, दिल्ली से 1995 में 10वीं और 1997 में 12वीं की परीक्षा पास की। इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से वर्ष 2001 में बीए की डिग्री हासिल की।
यानी राजनीति में आने से पहले उनकी शिक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दिल्ली में हुआ।
2008 के विधानसभा चुनाव के समय उनकी उम्र 32 वर्ष दर्ज की गई थी। 2013 में दाखिल हलफनामे में उनकी उम्र 37 वर्ष दर्ज हुई। उस समय उनके पेशे के तौर पर ‘हाउस वाइफ एंड MLA’ दर्ज था।
यह विवरण उस दौर की राजनीति की एक अलग तस्वीर सामने रखता है—एक ऐसी महिला, जिसकी पहचान किसी लंबे राजनीतिक पद या पारंपरिक सत्ता संरचना से नहीं, बल्कि चुनावी जीत के बाद विधायक के रूप में बनी।
बस्सी की राजनीति में बदला समीकरण
बस्सी विधानसभा सीट राजस्थान की उन सीटों में रही है, जहां कई बार बीजेपी और कांग्रेस के अलावा निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी प्रभाव दिखाया है।
2003 तक इस सीट पर बीजेपी का प्रभाव रहा। लेकिन 2008 में समीकरण अचानक बदल गया।
अंजू देवी धानका निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरीं। मुकाबले में बीजेपी के कन्हैया लाल समेत कई प्रत्याशी थे। चुनाव परिणाम आया तो अंजू धानका ने बड़ी जीत दर्ज कर राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया।
राजस्थान निर्वाचन विभाग के आधिकारिक परिणाम के मुताबिक 2008 में अंजू देवी धानका को 54,098 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार कन्हैया लाल को 21,932 वोटों के अंतर से हराया।
यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी।
यह बस्सी के राजनीतिक समीकरण में एक बड़ा बदलाव था।
क्योंकि एक निर्दलीय महिला उम्मीदवार ने स्थापित राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को पीछे छोड़ दिया था।
2008 की जीत ने बनाया नया राजनीतिक चेहरा
2008 के चुनाव के बाद अंजू धानका बस्सी की विधायक बन गईं।
निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल करना अपने आप में बड़ी राजनीतिक चुनौती होती है। किसी राष्ट्रीय दल का चुनाव चिह्न, संगठनात्मक मशीनरी और पार्टी कार्यकर्ताओं का नेटवर्क निर्दलीय उम्मीदवार के पास उसी रूप में उपलब्ध नहीं होता।
ऐसे में अंजू धानका की जीत ने बस्सी में उनके व्यक्तिगत जनाधार की चर्चा शुरू कर दी।
उनकी पहली जीत ने यह संकेत दिया कि बस्सी के मतदाता पारंपरिक राजनीतिक विकल्पों से अलग जाकर भी उम्मीदवार को समर्थन दे सकते हैं।
लेकिन असली परीक्षा 2013 में होनी थी।
क्योंकि पहली जीत को राजनीतिक संयोग माना जा सकता था, मगर लगातार दूसरी जीत किसी भी नेता के लिए व्यक्तिगत जनाधार की बड़ी परीक्षा होती है।
2013 में फिर मैदान में उतरीं, फिर जीतीं
2013 के विधानसभा चुनाव में अंजू धानका ने एक बार फिर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा।
इस बार मुकाबला और भी दिलचस्प था।
उनके सामने नेशनल पीपुल्स पार्टी की अवंती मीणा, कांग्रेस के लक्ष्मण मीणा और बीजेपी के कन्हैया लाल जैसे उम्मीदवार थे। यानी प्रमुख राजनीतिक दलों के उम्मीदवार मैदान में मौजूद थे।
लेकिन परिणाम एक बार फिर अंजू धानका के पक्ष में गया।
राजस्थान निर्वाचन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अंजू धानका को 48,095 वोट मिले। उन्होंने दूसरे स्थान पर रहीं अवंती मीणा को 11,339 वोटों से हराया। कांग्रेस उम्मीदवार लक्ष्मण मीणा तीसरे और बीजेपी के कन्हैया लाल चौथे स्थान पर रहे।
यह जीत इसलिए खास थी क्योंकि अब इसे केवल 2008 का चुनावी अपवाद नहीं कहा जा सकता था।
अंजू धानका लगातार दूसरी बार बस्सी की विधायक बन चुकी थीं।
महिला होने के साथ निर्दलीय होना भी बनी पहचान
राजस्थान की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है, लेकिन किसी आरक्षित विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय महिला प्रत्याशी का लगातार दो बार जीतना एक अलग राजनीतिक कहानी है।
अंजू धानका के मामले में चुनावी रिकॉर्ड सबसे महत्वपूर्ण है।
2008 में उनकी जीत का अंतर 21,932 वोट था।
2013 में भी उन्होंने 11,339 वोटों से जीत दर्ज की।
दो चुनाव…
दोनों बार निर्दलीय…
और दोनों बार जीत।
यही आंकड़े उनके राजनीतिक सफर की सबसे मजबूत पहचान बनते हैं।
क्या था बस्सी का चुनावी मिजाज?
अंजू धानका के उदय को समझने के लिए बस्सी की चुनावी राजनीति को देखना भी जरूरी है।
बस्सी में अलग-अलग चुनावों में बीजेपी, कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों को मतदाताओं का समर्थन मिलता रहा है। 1990 में भी निर्दलीय उम्मीदवार ने यहां जीत दर्ज की थी। इसके बाद 1993, 1998 और 2003 में बीजेपी ने सीट जीती। फिर 2008 में अंजू धानका और 2013 में भी अंजू धानका निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विजयी रहीं।
इससे पता चलता है कि बस्सी का मतदाता हमेशा केवल पार्टी के आधार पर फैसला नहीं करता रहा।
यही चुनावी माहौल अंजू धानका के लिए भी अवसर बना।
राजनीति में कैसे आईं?
अंजू धानका के राजनीतिक जीवन की शुरुआत को लेकर उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में किसी बड़े राजनीतिक परिवार या लंबे संगठनात्मक पद का स्पष्ट विवरण नहीं मिलता। उनके चुनावी हलफनामे मुख्य रूप से उनकी व्यक्तिगत, शैक्षणिक और चुनावी जानकारी दर्ज करते हैं।
इसलिए उनके राजनीतिक प्रवेश को लेकर यह दावा करना उचित नहीं होगा कि वे किसी खास संगठन से किस वर्ष जुड़ीं या किस नेता के माध्यम से राजनीति में आईं—जब तक उसका प्रमाणित स्रोत उपलब्ध न हो।
लेकिन इतना स्पष्ट है कि 2008 में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सीधे विधानसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक ताकत आजमाई और परिणाम उनके पक्ष में रहा।
यही चुनाव उनकी सार्वजनिक राजनीतिक पहचान का निर्णायक मोड़ बना।
2013 की जीत ने साबित किया कि पहला चुनाव महज संयोग नहीं था
पहली जीत के बाद किसी भी नेता के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने जनाधार को कायम रखना होती है।
अंजू धानका के सामने भी यही परीक्षा थी।
2013 में उनके खिलाफ बीजेपी और कांग्रेस के साथ-साथ दूसरे प्रभावशाली उम्मीदवार भी मैदान में थे। इसके बावजूद उन्होंने 48,095 वोट हासिल किए और लगातार दूसरी बार विधायक चुनी गईं।
इस परिणाम ने बस्सी में उनके व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव को स्थापित किया।
हालांकि 2018 में तस्वीर बदल गई। इस चुनाव में निर्दलीय लक्ष्मण मीणा ने जीत दर्ज की और अंजू धानका विधानसभा में वापस नहीं पहुंच सकीं। बस्सी में निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रभाव हालांकि जारी रहा।
राजनीति का सफर सिर्फ दो चुनावों तक सीमित नहीं
अंजू धानका ने बाद के वर्षों में भी चुनावी राजनीति में अपनी मौजूदगी बनाए रखी। उनके चुनावी रिकॉर्ड में 2014 लोकसभा और 2018 विधानसभा चुनाव सहित बाद के चुनावों में भी प्रत्याशी के रूप में विवरण दर्ज है। 2013 के हलफनामे में उनके पास स्नातक शिक्षा और उस समय 25.50 लाख रुपये की घोषित संपत्ति दर्ज थी।
उनके नाम पर उपलब्ध चुनावी हलफनामों में आपराधिक मामलों की संख्या शून्य दर्ज की गई थी।
अंजू धानका की कहानी का सबसे बड़ा संदेश
अंजू धानका का राजनीतिक सफर राजस्थान की उस चुनावी तस्वीर को सामने लाता है, जिसमें कभी-कभी पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार की स्थानीय पहचान और मतदाताओं का भरोसा निर्णायक हो सकता है।
बस्सी जैसे विधानसभा क्षेत्र में…
जहां बीजेपी और कांग्रेस दोनों की मौजूदगी रही…
जहां अलग-अलग दौर में राजनीतिक समीकरण बदलते रहे…
वहां एक महिला ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लगातार दो बार जीत हासिल की।
2008—पहली जीत।
2013—दूसरी जीत।
और दोनों बार किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल के टिकट के बिना।
यही अंजू धानका की राजनीतिक यात्रा की सबसे बड़ी खासियत है।
उनकी कहानी किसी लंबे राजनीतिक पद की नहीं, बल्कि चुनावी मैदान में उतरकर अपनी जगह बनाने की कहानी है। शिक्षा पूरी करने के बाद सार्वजनिक जीवन में आईं अंजू धानका ने बस्सी के मतदाताओं के बीच अपनी पहचान बनाई और दो लगातार विधानसभा चुनाव जीतकर राजस्थान की राजनीति में अपना नाम दर्ज कराया।
अंजू धानका की कहानी इस सवाल का जवाब भी देती है कि क्या बिना बड़े राजनीतिक संगठन के कोई महिला विधानसभा तक पहुंच सकती है? बस्सी के 2008 और 2013 के चुनाव परिणाम इसका स्पष्ट उदाहरण हैं।
एक निर्दलीय महिला प्रत्याशी के रूप में दो बार जीत, बीजेपी-कांग्रेस जैसे प्रमुख दलों के उम्मीदवारों को पीछे छोड़ना और पांच साल के अंतराल में अपना जनाधार दोबारा साबित करना—यही वह सफर है जिसने अंजू धानका को बस्सी की राजनीति में एक अलग पहचान दी।