शील धाभाई को कार्यवाहक महापौर का चार्ज

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जयपुर । इसे कहते हैं लक बाय चांस । शील धाभाई को जयपुर की तीसरी बार महापौर बनने का सौभाग्य मिला है। सबसे पहले उन्हें जयपुर की महापौर निर्मला वर्मा के निधन के बाद महापौर की खाली हुई सीट पर पार्षद बनने का अवसर मिला। पार्षद बनने के साथ ही उन्हें जयपुर की प्रथम नागरिक महापौर बना दिया गया। धाबाई ने इस दौरान अपने काम से जयपुर शहर की अलग पहचान बनाई और खुद की भी जयपुर वासियों पर एक छाप छोड़ी। इस बार भी जयपुर ग्रेटर नगर निगम की महापौर की सीट ओबीसी महिला वर्ग के लिए आरक्षित हुई। शील धाबाई भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ पार्षद होने के नाते और पूर्व महापौर होने के नाते महापुर की सबसे प्रबल दावेदार थी। लेकिन भाजपा नेताओं की टेढ़ी नजर के चलते शील धाभाई को अवसर नहीं मिला। डॉक्टर सौम्या गुर्जर को जयपुर की महापौर बना दिया गया। 1 साल के कार्यकाल के बाद ही जयपुर नगर निगम में मुख्य कार्यकारी अधिकारी से हुए विवाद और मारपीट के मामले में जयपुर की महापौर डॉक्टर सौम्या गुर्जर को राज्य सरकार ने बर्खास्त कर दिया। इस पर राजस्थान सरकार ने शील धाभाई को कार्यवाहक महापौर नियुक्त कर दिया । सोनिया गुर्जर इसके विरोध में कोर्ट गई और कोर्ट में गुर्जर को फिर से महापौर का चार्ज दे दिया ।अब दूसरी बार सरकार फिर कोर्ट गई और कोर्ट ने इस मामले में सौम्या गुर्जर और तीन पार्षदों को दोषी मानते हुए उन्हें 6 साल के लिए बर्खास्त कर दिया। अब सौम्या गुर्जर के बर्खास्त होने के बाद राजस्थान सरकार ने तीसरी बार फिर से शील धाभाई धाभाई को जयपुर नगर निगम ग्रेटर का महापौर का कार्यभार सौंप दिया । शील धाभाई के लिए महापौर की कुर्सी लक बाई चांस थी। हालांकि धाबाई सभी पार्षदों को साथ लेकर चलती है ।अधिकारियों और कर्मचारियों में भी उनकी अच्छी पकड़ है। लोग भी उनका सम्मान करते हैं। लेकिन इस बार पार्टी में उन्हें कभी भी महापौर बनाने को लेकर एक राय नहीं थी। इसीलिए उनके स्थान पर पार्टी ने डॉक्टर सौम्या गुर्जर को महापौर नियुक्त किया था । लेकिन उनका दुर्भाग्य है कि 3 साल के कार्यकाल में ही उन्हें दो बार बर्खास्त होना पड़ा और पद छोड़ना पड़ा और अब तो उनके 6 साल चुनाव लड़ने पर कोर्ट में ही रोक लगा दी है। ऐसे में डॉक्टर सौम्या गुर्जर को दो बार पार्टी के द्वारा महापौर बनाने के बावजूद भी वह इस कुर्सी पर काम नहीं कर सकी ।वहीं शीला धाबाई पार्टी के नहीं बनाने और पार्टी के नेताओं की अनिच्छा के बावजूद लक बाय चांस के चलते तीसरी बार जयपुर शहर का महापौर बनने का अवसर मिल गया इसे कहते हैं किस्मत के सितारे ।

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