
झालावाड़, निमोदा। आजादी के 71 साल बाद भी देश में कुछ लोगों की मानसिकता अभी तक नहीं बदली है। जहां एक और लोग चांद पर घर बनाने की बात कर रहे हैं ,दूसरी तरफ अभी भी ऐसी घटिया मानसिकता के लोग कहीं ना कहीं मिल जाते हैं, जो लोग जात और धर्म के नाम पर भेदभाव करने से नहीं चूकते। उनको मौका लगते ही उनका झूठ ,अहंकार, जाग उठता है और वे अपने से निम्न कही जाने वाली जातियों के लोगों के साथ अत्याचार करने से नहीं रुकते । उनकी सोच है कि दलित और आदिवासी वर्ग के लोग तो सिर्फ उनकी गुलामी के लिए पैदा हुए हैं। जबकि देश में संविधान का शासन है, सबको बराबरी का हक है, लेकिन लोग आज भी गांवों में वह डर के चलते कई बार चुप रह कर सब कुछ सहन करते हैं ।

निमोदा गांव का मामला
झालावाड़ के निमोदा गांव में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जहां जब स्थानीय ग्रामीणों को पता लगा कि दलित वर्ग के दूल्हे की बिंदोरी निकाली जाएगी, तो तथाकथित झूठें दंभ में डूबे हुए कुछ असामाजिक तत्वों ने उन्हें बिंदोरी निकलने से मना कर दिया। पीड़ित परमेश्वर मेघवाल ने पुलिस को भी रिपोर्ट में बताया कि गांव में उसकी और उसकी बहन की शादी है। बुधवार को बिनोरी निकालने के लिए गांव में डीजे आया तो उसको कुछ स्थानीय कथित ऊंची जाति के असामाजिक तत्वों ने डीजे बजाने से मना कर दिया और परिणाम भुगतने की धमकी दी । असामाजिक तत्वों का कहना था कि यहां कभी भी एससी वर्ग की जाति के दूल्हे की बारात या बिंदोरी घोड़ी बाजे से नहीं निकली है, तो अब भी नहीं निकलेगी। इस पर पीड़ित ने किसी भी तरह के विवाद से बचने और डीजे पर बिंदोरी निकालने के लिए पुलिस में रिपोर्ट दी। पीड़ित की सूचना पर स्थानीय पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुंचे और पुलिस की मौजूदगी में ही दलित वर्ग के दूल्हे की डीजे और घोड़ी पर बिंदोरी निकाली गई। दूल्हे के परिजनों व अन्य ग्रामीणों ने बताया कि वे काफी समय से देख रहे हैं कि गांव में दलित लोगों को बिंदोरी नहीं निकलना दी जाती है। ग्रामीणों ने बताया कि आजादी के बाद से यहां किसी की भी बिंदोरी नहीं निकली है। ऐसे में अभी भी कुछ लोगों को लगता है कि दलित समाज और आदिवासी वर्ग के लोगों को बिंदोरी निकालने का अधिकार नहीं है ,जबकि सामान्य वर्ग के ही कुछ लोग चाहते हैं कि सबको बराबरी का हक है। सबको सब तरह की आजादी है, जिसके पास पैसा है, वह अपनी बारात घोड़ी पर निकाले ,बैंड से निकाले या हवाई जहाज से निकाले, किसी को क्यों ऐतराज़ होना चाहिए। एससी वर्ग के लोग भी बिंदोरी हर्षोल्लास के साथ निकाले। लेकिन कुछ असामाजिक तत्व जिनकी मानसिकता घठिया है, उनका मानना है कि यह अधिकार सिर्फ उनका है और दलित आदिवासी वर्ग के लोगों को यह नहीं निकलना चाहिए । इसीलिए अधिकांश लोग इन असामाजिक तत्वों के डर से बिंदोरी निकलते ही नहीं है । यह कई वर्षों से चल रहा था यदि किसी ने ऐसा करने की हिम्मत की तो फिर यह सामाजिक तत्व हली बार अचानक हमला करते हैं यह दावा बोलते हैं या धोखे के साथ परिवार के साथ मारपीट करते हैं जिससे उनका दबदबा बरकरार रहे उन लोगों में दहशत बनी रहे लेकिन इस तरह के लोगों को सोचना होगा कि कोई भी व्यक्ति पैसा खर्च करके कुछ भी कर सकता है जो उसके अधिकार सीमा में है और जब कोई व्यक्ति अपनी शादी विवाह के दौरान बिंदोरी निकल रहा है यह घोड़ी बारात निकल रहा है तो उसको किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि जो कमजोर बाजी के लोग हैं उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं है।

















































