सीमा…….✒️✒️✒️✒️

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक
किसी भी समाज को संगठित और प्रगतिशील बनाने में समाज की सामाजिक संस्थाओं का अमूल्य योगदान होता है यह संस्थाएं समाज को एक जाजम पर तो लाती ही है साथ ही शिक्षा ,विकास ,रोजगार ,शादी विवाह या सामाजिक आयोजनों का प्रमुख स्थल भी होती है ।
जब सवर्ण समाजों की सामाजिक संस्थाओं का गहराई से अध्ययन किया जाए तो यह 90% समाज को आगे बढ़ाने व संगठित करने का कार्य ही कर रही है कभी कभार वहां भी 8 से 10% राजनीति हो ही जाती है पर उनके लिए समाज की एकता और विकास महत्वपूर्ण होने से गलतियों और राजनीतिक कमजोरियों को दूर करने के सकारात्मक प्रयास किए जाते है।
दलित समाज की अनेक जातियां
अब नजर डालते दलित समाज के संगठनों पर तो यहां पहले से ही सैकड़ों जातियों में विभाजित दलित समाज इन संस्थाओं के माध्यम से और अधिक असंगठित हो गया है यहां हर जाति की एक अलग संस्था और एक अलग हॉस्टल तो है ही साथ ही तमाम सामाजिक कार्यक्रम जैसे सम्मान समारोह ,वैवाहिक सम्मेलन ,मिलन समारोह सभी अलग अलग होते हैं तो जातीय एकता तो नामुमकिन है ही दलित समाज का उत्थान और विकास भी असंभव ही है ।
जातियों में भी जातिगत डैम की भावना
साथ ही कुछ बड़ी राज्य स्तरीय संस्थाओं में भी जातीय वर्चस्व कायम रखने का प्रयास उस संस्थान के उच्च पदाधिकारियों द्वारा अक्सर किया जाता है जब कार्यकारणी का निर्माण होता है तो और दिखावे के लिए अलग अलग जाति के कुछ गूंगे बहरे लोगों को प्रतिनिधित्व दे दिया जाता है ताकि सबको चुप कराया जा सके फिर संस्थाओं को जाति विशेष का अड्डा बना दिया जाता है अन्य को गौण कर दिया जाता है।
जाति संगठनों के आधार पर राजनीतिक भूख
सभी सामाजिक संस्थाओं में चुनाव के समय या निर्माण के दौरान ही समाज के लिए काम करने के नाम पर बड़े बड़े वादे किए जाते है और कुछ दिन बाद ही सारे उच्च पदाधिकारी जो संस्थाओं में मुख्य पदों पर होते हैं राजनीतिक टिकट की लाइन में खड़े नजर आते हैं ।और यहीं से बाबा साहेब के शिक्षित , संगठित होने के सिद्धांत को टुकड़े टुकड़े होते सभी लोग देखते रहते हैं पर करते कुछ नहीं हैं बोलते कुछ नहीं हैं।
संगठनों के पीछे राजनीतिक भूख
दलित समाज की सभी
जातियों में कई लोग
अपनी अपनी राजनीतिक, सामाजिक महत्वकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सामाजिक संस्थाओं का नित न्याय संसार खड़ा करते रहते हैं फिर उन्हें राजनीतिक अखाड़े बना देते हैं और उन संस्थाओं के माध्यम से राजनीतिक गलियारों में चक्कर लगाते रहते हैं या सोशल मीडिया पर हाथ जोड़े नजर आते है और समाज को भूल कर खुद के विकास के लिए दांव पेच खेलते नजर आते हैं
और इन दांव पेचों में समाज के भोले भाले लोग तो पिसते ही है साथ ही वो लोग भी इनके मकड़ जाल में फंस जाते हैं जो वास्तव में समाज के लिए काम करना चाहते हैं पर उन्हें करने नहीं दिया जाता है ।
ऐसे में कैसे दलित समाज का विकास होगा ????
अतः अब समय संगठन बनाने का नहीं बल्कि संगठित हो कर काम करने का है जितना हो सके समाज को आगे लाने, साथ देने का कार्य करें इसके लिए किसी संगठन की नहीं बल्कि आपकी इच्छा शक्ति और लगन की आवश्यकता है कुछ न कुछ करते रहिए एक दिन आपकी मुहिम रंग लाएगी , समाज में बदलाव भी आएगा ।
सीमा हिंगोनिया
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक
9414006994

















































