अध्ययन अध्यापन से दूर दलित समाज- सीमा हिंगोनिया

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सीमा हिंगोनिया
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक,बीकानेर

दलित समाज में अध्ययन अध्यापन की रुचि अभी 1% भी नहीं है अभी इन्होंने किताबों के साथ सिर्फ फोटो खिंचवाना ही सीखा है ,
या बाबा साहब की लिखी किताबों की कॉपी करना ही सीखा है।
आप ब्राह्मण समाज से अपनी बराबरी करना चाहते हैं जिन्होंने हजारों साल से सिर्फ अध्ययन और अध्यापन ही किया है और अपनी आजीविका और राजनीति का आधार भी शिक्षा को ही बनाया है ।
कुछ लोग कहेंगे कि ब्राह्मणों ने हमारा हजारों साल से शिक्षा का अधिकार छीन लिया तो यहां में कहना चाहूंगी कि अब तो आजादी को भी 75 वर्ष हो गए और देश बाबा साहब के संविधान से चल रहा है और आपको शिक्षा का अधिकार 1950 में मिल ही गया तो आज तक किताबों को फोटो खींचने का माध्यम क्यूं बना रखा है ????
आज कल संविधान की पुस्तक बाटने का बड़ा चलन है
क्या कोई संविधान को पढ़ता भी है?????
या सिर्फ बांटने और फोटो खिंचवाना ही क्रांति मानी जाएगी ????
पढ़ने का मतलब नौकरी की किताबों से अलग हट कर पढ़ना है
पढ़ने का मतलब दिमाग को विकसित करना है
पढ़ने का मतलब अपने अधिकारों के लिए खुद से लड़ना है
पढ़ने का मतलब कानूनी संघर्ष खुद से करना है
पढ़ने का मतलब अंधविश्वास और पाखंड से दूर जाना है ,
पढ़ने का मतलब बुद्धिजीवियों के मध्य तार्किक बात करना और करके सीखना और
पढ़ने का मतलब परंपरा से हटकर कार्य करना ,
पढ़ने का मतलब अपने से कम को पढ़ाना और आगे बढ़ाना भी है
कुछ नया करो किसी की भी आलोचनाओं से दलित समाज का भला नहीं होगा

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