लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
रिपोर्ट: मनजीत सिंह
श्रीगंगानगर। 23 मार्च भारतीय इतिहास का वह दिन है जब महान क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेजी हुकूमत ने लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी थी। यह केवल तीन व्यक्तियों की शहादत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के उस विचार की प्रतीक घटना थी जिसने पीढ़ियों को प्रेरित किया।
लगभग एक सदी बाद भी भगत सिंह का नाम युवाओं, विद्यार्थियों और मेहनतकश वर्ग के बीच प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। उस समय अंग्रेजी साम्राज्य विश्व की सबसे शक्तिशाली ताकतों में गिना जाता था, जिसने आर्थिक शोषण, राजनीतिक दमन और सामाजिक असमानता के जरिए भारत सहित कई देशों पर नियंत्रण स्थापित कर रखा था।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जहां एक धारा केवल सत्ता हस्तांतरण तक सीमित थी, वहीं भगत सिंह और उनके साथियों की सोच व्यापक थी। वे केवल अंग्रेजों को हटाना नहीं, बल्कि शोषण आधारित व्यवस्था को बदलना चाहते थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने नौजवान भारत सभा जैसे संगठनों का निर्माण किया और समाजवादी व्यवस्था की कल्पना प्रस्तुत की।
भगत सिंह केवल साहसी क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि गहरे चिंतक और दार्शनिक भी थे। उनकी रचनाएं जैसे “मैं नास्तिक क्यों हूँ”, “विद्यार्थी और राजनीति”, “अछूत का सवाल” और उनकी जेल डायरी आज भी समाज को समझने का मार्गदर्शन करती हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि गरीबी, बेरोजगारी, जातिवाद और सामाजिक असमानता का मूल कारण शोषण पर आधारित आर्थिक व्यवस्था है।
आज के परिप्रेक्ष्य में उनके विचार और भी प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक विषमता जैसी समस्याएं आज भी समाज के सामने बड़ी चुनौती हैं। भगत सिंह ने तकनीकी प्रगति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाने और कार्यदिवस को सीमित करने जैसे विचार प्रस्तुत किए थे, जो आज भी रोजगार और श्रमिक अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने युवाओं और विद्यार्थियों से आह्वान किया था कि वे केवल पढ़ाई तक सीमित न रहें, बल्कि समाज और राजनीति की समझ विकसित करें और परिवर्तन में सक्रिय भूमिका निभाएं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भगत सिंह को केवल श्रद्धांजलि और नारों तक सीमित न रखें, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात कर समाज में समानता, न्याय और मानवता पर आधारित व्यवस्था के निर्माण की दिशा में कार्य करें।
वास्तव में, भगत सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारें, क्योंकि केवल उनकी शहादत को याद करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके आदर्शों पर अमल करना ही सच्चा सम्मान है।



















































