Home Chhattisgarh “नीतियों के ऋषि: डॉ. पी. के. मिश्र की कर्मगाथा”

“नीतियों के ऋषि: डॉ. पी. के. मिश्र की कर्मगाथा”

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हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
मौन का नायक

जब राष्ट्र के मंच पर प्रचंड नारे, भाषणों की गरज और कैमरों की चकाचौंध छाई होती है — कुछ लोग होते हैं जो बोलते नहीं, बस कर्म की मौन भाषा में इतिहास लिखते हैं।
ऐसे ही एक ऋषितुल्य प्रशासक हैं — डॉ. पी. के. मिश्र।
वो न तो टीवी बहसों में दिखते हैं, न अख़बारों की सुर्खियाँ बनते हैं।
लेकिन जब कोई नीति गरीब की रसोई तक पहुँचती है,
जब कोई आपदा टलने से पहले तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं,
तो परदे के पीछे एक मन, एक मस्तिष्क — डॉ. मिश्र होता है।

‘सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन’ के साधक

सरकारी फ़ाइलें उनके लिए कागज़ के पुलिंदे नहीं,
बल्कि राष्ट्र निर्माण के मंत्रों की पोथियाँ हैं।

उन्होंने शासन को केवल आदेश का औज़ार नहीं, बल्कि लोक कल्याण की साधना माना।
जहाँ अधिकांश नौकरशाह सत्ता के निकट जाने की दौड़ में रहते हैं,
वह वहाँ रहे — जहाँ नीतियाँ जन्म लेती हैं और राष्ट्र दिशा पाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्द —
“Reform, Perform, Transform”
जब एक नारा था, तब डॉ. मिश्र ने उसे मिशन बना दिया।

आपदा में अवसर: अग्निपथ का संयोजक

जब देश ने भूकंप, बाढ़ और चक्रवात का सामना किया, तब वह पहले व्यक्ति थे, जो दूरदर्शिता का छाता लेकर मैदान में उतरे।

उन्होंने ‘आपदा प्रबंधन’ को कागजी कार्रवाई से निकाल कर जीवन रक्षा का विज्ञान बनाया।

Sendai Framework, NDMA, PM Relief Packages —
इन सब के पीछे एक मौन हस्ताक्षर — डॉ. मिश्र।

उनकी रणनीतियाँ इतनी गहरी थीं कि
आपदा आने से पहले तैयारी पूरी हो जाती थी।

किसान का संरक्षक: धरतीपुत्रों के लिए योजनाओं का सृजन

कृषि उनके लिए केवल ‘विकास क्षेत्र’ नहीं था —वह भारतीय आत्मा का भूगोल था।

उन्होंने फसलों की नहीं, किसानों की नीति बनाई। उनकी दृष्टि में खेत केवल अन्नदाता का क्षेत्र नहीं,बल्कि राष्ट्र की आत्मनिर्भरता की प्रयोगशाला रही है।

“प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना”, “मृदा स्वास्थ्य कार्ड”,
“डिजिटल मंडियाँ” —ये सब योजनाएँ नहीं, संवेदनशीलता से जन्मी क्रांतियाँ थीं।

सत्ता से दूरी, उत्तरदायित्व से नाता

वे ना किसी दल के थे, ना किसी चेहरे के — वे केवल कर्तव्य के पक्ष में खड़े एक मौन कर्म वीर।

उन्हें ना पद मोह रहा, ना प्रचार की लालसा।
वे चलते जा रहे है — जैसे तट पर दीपक, जो समंदर की लहरों से नहीं डरता, बल्कि उन्हें रास्ता दिखाता है।

उनके दस्तावेज़ों में भविष्य का नक्शा होता है, उनकी चुप्पी में राष्ट्रीय रणनीति की अनुगूँज।

एक प्रेरणा, एक पथ

जब युवा अधिकारी आदर्श ढूँढते हैं,
तो उन्हें किसी बड़े भाषण की नहीं,
बल्कि मौन आदर्शों की आवश्यकता होती है।

डॉ. पी. के. मिश्र का जीवन यही कहता है: “पद बड़ा नहीं होता, दृष्टि बड़ी होनी चाहिए। काम बड़ा नहीं होता, भावना ईमानदार होनी चाहिए और नेतृत्व मुखर नहीं, मूल्यनिष्ठ होना चाहिए।”

डॉ. पी. के. मिश्र की कहानी, किसी बायोग्राफी का हिस्सा नहीं,
बल्कि आधुनिक भारत के प्रशासनिक पुराण का एक श्लोक है।

वे हमें सिखाते हैं कि यदि निष्ठा, विवेक और दूरदर्शिता को अपने कर्म का आधार बनाया जाए, तो एक साधारण अफसर भी असाधारण राष्ट्र निर्माता बन सकता है।

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