लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
जयपुर। आज का समाज जिस दिशा में जा रहा है, वह न केवल चिंताजनक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी भी है। जब किसी समाज का उद्देश्य सहयोग नहीं, बल्कि शोषण बन जाए—तो वह समाज अपने पतन की ओर अग्रसर हो जाता है। और यही हो रहा है हमारे चारों ओर।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ मूल्य, नैतिकता, और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे शब्द केवल किताबों और भाषणों में रह गए हैं। वास्तविक जीवन में लोग दूसरों को गिराकर, दबाकर, और इस्तेमाल करके ऊपर उठने की होड़ में लगे हैं। यह प्रतिस्पर्धा स्वस्थ नहीं है; यह असामाजिक प्रतिस्पर्धा है, जहाँ इंसानियत हारती है और चालाकी जीतती है।
शोषण बनाम सहयोग
सभ्यता की असली पहचान इस बात में होती है कि वह कमजोर वर्ग की रक्षा कैसे करती है, न कि उसे कैसे कुचलती है। लेकिन आज के समाज में जैसे ही किसी की कमज़ोरी सामने आती है, लोग उसे सहारा देने के बजाय शोषण करने का अवसर ढूंढ़ने लगते हैं। इस प्रवृत्ति ने हर क्षेत्र को प्रभावित किया है—चाहे वह कार्यस्थल हो, शिक्षा, राजनीति, या व्यक्तिगत संबंध।
इतिहास का आइना
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी समाज में संवेदनशीलता और न्याय की भावना खत्म हुई है, वह समाज अधिक समय तक स्वतंत्र नहीं रह पाया। पहले वह अंदर से खोखला होता है, फिर बाहरी शक्तियाँ उस पर नियंत्रण पा लेती हैं। भारत ने गुलामी के 200 साल भुगते—केवल बाहरी हमलों के कारण नहीं, बल्कि अपने भीतर की टूटन, आपसी विश्वास की कमी, और वर्गभेद के कारण।
चेतावनी की घड़ी
आज फिर वही संकेत दिखने लगे हैं। समाज की ऊपरी चमक के पीछे एक गहरी सड़ांध छिपी है—जहाँ रिश्ते स्वार्थ से तय होते हैं, जहाँ ज्ञान एक हथियार बन चुका है, और जहाँ “प्रोफेशनलिज़्म” का मतलब है — “तुम्हारा जितना उपयोग कर सकते हैं, करेंगे, फिर छोड़ देंगे।” यह व्यवहार हमें एक आत्मनिर्भर और सशक्त समाज नहीं, बल्कि एक फिर से गुलाम बनने वाला समाज बना रहा है।
समाधान की दिशा
हमें अपने सोच के ढाँचे को बदलने की ज़रूरत है। शोषण से शक्ति नहीं मिलती, बल्कि वह हमें दीमक की तरह खोखला करता है। यदि हम सच में एक सशक्त राष्ट्र और समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें सहयोग, करुणा और सामूहिक उत्थान की भावना को फिर से ज़िंदा करना होगा।
यदि समाज ने दूसरों को शोषण करना ही अपना ध्येय बना लिया है, तो वह बहुत जल्द फिर से गुलाम बनने के लिए तैयार हो रहा है। यह गुलामी किसी और के हाथों नहीं, बल्कि हमारे ही विकृत व्यवहारों की देन होगी। इसीलिए समय रहते चेत जाना ही बुद्धिमानी है, वरना आने वाला कल इतिहास को दोहराने से नहीं चूकेगा।
लेखक: हेमराज तिवारी













































