लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
जितेन्द्र सिंह शेखावत वरिष्ठ पत्रकार
जयपुर। राजपूताना में जयपुर रियासत ही ऐसी रही जिसे संस्कृत भाषा के विकास का श्रेय मिलता है। विद्वानों को यहां लाकर बसाने के कारण इस नगर को विद्वानो की दूसरी काशी कहने लगे । बड़ी चौपड़ के नीचे रामचन्द्र जी के मंदिर में सन् 1844में महाराजा संस्कृत कालेज की स्थापना की गई।
अंग्रेजियत और आधुनिकता से प्रभावित होने के उपरांत भी सवाई राम सिंह संस्कृत और संस्कृति के अनन्य उपासक बने ।प्रारंभ संस्कृत विद्यालय में आठ शिक्षक थे, जो वेद व्याकरण साहित्य, ज्योतिष, आयुर्वेद तथा गणित पढाते थे । धीरे-धीरे जैसे-जैसे छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई शिक्षकों की संख्या भी बढ़ाई गई । वर्ष 1889 में यहां उपाध्याय, शास्त्री एवं आचार्य कक्षाएं प्रारंभ हुई ।
संस्कृत विद्वानों की बहुलता से कहलाया जयपुर छोटी काशी
संस्कृत विद्वान प्रो. सुभाष शर्मा के मुताबिक संस्कृत कॉलेज के प्रथम अध्यक्ष एकनाथ झा थे । उनके पुत्र नरहरि झा, पौत्र चंद्र दत्त झा व प्रपौत्र दुर्गा दत्त झा ने भी इस संस्था में अध्यापन किया । यह सब व्याकरण शास्त्र के उच्च कोटि के विद्वान थे । महाराजा संस्कृत कॉलेज को देश के विख्यात संस्कृत विद्वानों की कर्म भूमि होने का गौरव प्राप्त है । संस्कृत में शस्त्रों, वेद, व्याकरण, साहित्य ,ज्योतिष, न्याय , वेदांत, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद आदि के विशिष्ट विद्वानों को देश के विभिन्न स्थानों से आमंत्रित किया गया ।
संस्कृत कॅालेज की थी विशेष पहचान
इस कॉलेज की प्राचार्य परंपरा में एकनाथ झा के पश्चात चंद्रधर गुलरी के पिता राममज सारस्वत ,लक्ष्मी नाथ शास्त्री द्राविड़, महा महो पाध्याय दुर्गा प्रसाद द्विवेदी, गिरधर शर्मा चतुर्वेदी, पंडित घूटर झा, पी एन पट्टाभिराम शास्त्री,मीमांसाचार्य माधव कृष्ण शर्मा, चंद्रशेखर द्विवेदी तथा पंडित गोविंद नारायण शास्त्री जैसे अद्भुत प्रतिभा के धनी संस्कृत के उत्कृष्ट विद्वानों का नाम है । देश के सुप्रसिद्ध संस्कृत विद्वानों को यहां विविध शास्त्रों की शिक्षा देने के लिए नियुक्त किया गया इसलिए जयपुर को द्वितीय काशी कहला ने का श्रेय मिला । इस संस्था में अध्ययन कर विद्वता के शिखर को छूने वाले विद्वानों में महोमहापाध्याय शिवदत्त शास्त्री, मधुसूदन ओझा, लक्ष्मी राम स्वामी, गिरधर शर्मा चतुर्वेदी, पंडित बद्री प्रसाद शास्त्री, चंद्रधर गुलेरी आदि प्रमुख है ।
