रेत की नगरी में पत्थरों पर बुना सपना – पटवों की हवेली, जैसलमेर

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 – पटवों की हवेली, जैसलमेर क्यों है खास 

कंटेंट : राखी जैन वरिष्ठ पत्रकार

 जैसलमेर… भारत का सुनहरा शहर।  यहां की रेत सिर्फ गर्म नहीं, इतिहास की धड़कनों से भरी होती है।  हर इमारत जैसे समय की एक परत हो और जब आप पटवों की हवेली के पास खड़े होते हैं, तो वो सिर्फ पत्थर नहीं लगते, ऐसा लगता है मानो किसी कलाकार ने अपनी आत्मा से उसे गढ़ा हो।

कहानियों से बनी हवेली

1805 में बनी पटवों की हवेली दरअसल एक हवेली नहीं, बल्कि पांच हवेलियों का समूह है, जिसे जैसलमेर के प्रसिद्ध व्यापारी गुमानचंद पटवा और उनके पांच बेटों ने बनवाया था।  पटवा साहब ने कपड़ा और आभूषण व्यापार से अकूत संपत्ति अर्जित की और उसी धन से इस हवेली की नींव डाली लेकिन ये सिर्फ दिखावे के लिए नहीं था । यह हवेली उनकी सांस्कृतिक समझ, सौंदर्यबोध और शिल्प के प्रति प्रेम का प्रतीक थी।

स्थापत्य की अद्भुत मिसाल

यह हवेली राजस्थानी-इस्लामिक स्थापत्य शैली का अद्भुत संगम है।  आपको हर दरवाज़े, हर खिड़की, हर झरोखे पर जालीदार नक्काशी दिखेगी इतनी बारीक कि लगता है जैसे कोई महीन ज़री का काम हो. हवेली की दीवारें पत्थर की ज़रूर हैं, मगर उनमें दिल धड़कता है. हर मंज़िल, हर आंगन, हर गलियारा एक नई कहानी कहता है व्यापारियों का वैभव, महिलाओं की दिनचर्या, त्योहारों की रौनक, और उन गलियों में गूंजती पुरानी आवाज़ें… सब कुछ जैसे आज भी वहीं मौजूद है।

रौशनी और छायाओं का खेल

सुबह की पहली धूप जब हवेली के झरोखों से छनकर अंदर आती है, तो पूरी हवेली सोने की तरह चमकने लगती है।  जैसे रेत, पत्थर और सूर्य ने मिलकर किसी चित्रकार की कूंची से इसे बनाया हो।

 Lens man Yogesh Sharma की नज़र से

अब बात उस नज़र की, जिसने इस इतिहास को कैमरे में कैद किया — योगेश शर्मा

योगेश जी की खींची तस्वीरें सिर्फ दृश्य नहीं दिखातीं, वे एक अनुभव कराती हैं।  उनके कैमरे ने हवेली के झरोखों की नफ़ासत, दीवारों की गहराई, और रोशनी-छाया के खेल को जीवंत कर दिया है। 

 क्यों ज़रूरी है ये देखना?

अगर आप इतिहास को महसूस करना चाहते हैं, तो ये जगह आपको वहीं ले जाती है.अगर आप स्थापत्य की कद्र करते हैं, तो यहां हर दीवार एक जीवंत मूर्ति है, और अगर आप सिर्फ खूबसूरती के प्रेमी हैं, तो ये हवेली आपको बांध लेगी एक ऐसी बारीकी में जो शायद शब्दों से परे है।

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