लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
लेखिका : दिव्या राठौड़
राजधानी दिल्ली से लेकर मुंबई, जयपुर, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहरों तक लड़कियों की आवाज अब सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं है। वे सड़कों पर हैं, सवाल पूछ रही हैं और अपनी आजादी, सम्मान और सुरक्षा की बात खुलकर कर रही हैं।
इन प्रदर्शनों को देखकर एक सवाल बार-बार उठाया जा रहा है—आखिर लड़कियां मर्दों के खिलाफ क्यों खड़ी हैं?
लेकिन शायद सवाल थोड़ा बदलने की जरूरत है।
लड़कियां हर मर्द के खिलाफ नहीं हैं। वे उस सोच के खिलाफ हैं, जो किसी लड़की के साथ हुई बदसलूकी के बाद सबसे पहले उसी से पूछती है—“तुम वहां गई ही क्यों थीं?”
कपड़े कैसे थे?
रात में बाहर क्यों थीं?
किसके साथ थीं?
फोन पर किससे बात कर रही थीं?
उस जगह जाने की जरूरत क्या थी?
यानी अपराध किसी और ने किया, लेकिन सवाल लड़की से।
यही वह सोच है, जिसके खिलाफ लड़कियों की आवाज मुखर हो रही है।

उन्हें मर्दों से नहीं, डर से आजादी चाहिए
हर लड़की चाहती है कि उसका पिता उसे मजबूत बनाए, भाई उसका साथ दे, दोस्त उसकी बात समझे और समाज उसे बराबरी का इंसान माने।
वह यह नहीं कहती कि हर पुरुष अपराधी है।
वह सिर्फ इतना कहती है कि जो पुरुष किसी लड़की को असुरक्षित महसूस कराते हैं, उनके खिलाफ बाकी पुरुष भी आवाज उठाएं।
क्योंकि जब सड़क पर कोई बाइक सवार जानबूझकर किसी लड़की को छूकर निकल जाता है, भीड़ में कोई हाथ गलत जगह पहुंचता है, बस में कोई अपनी हरकत छिपाने की कोशिश करता है, कोई बिना अनुमति मोबाइल से तस्वीर खींचता है या रास्ते में पीछा करके डराता है—तो यह किसी एक बड़ी घटना का इंतजार नहीं करता।
डर रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं से बनता है।
कई लड़कियां घर से निकलते समय रास्ता नहीं, रास्ते में मिलने वाले लोगों के बारे में सोचती हैं।
यही डर उनकी आजादी को धीरे-धीरे छोटा करता है।
सुरक्षा के नाम पर पंख क्यों काटे जाएं?
अक्सर समाधान के नाम पर लड़कियों से कहा जाता है—अकेली मत जाना, देर रात बाहर मत रहना, सुनसान रास्ते से मत जाना, किसी अनजान से बात मत करना।
सावधानी जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि सारी सावधानी सिर्फ लड़कियों की जिम्मेदारी क्यों हो?
लड़कों से भी तो कहा जा सकता है—
किसी की सहमति के बिना उसे मत छुओ।
किसी का पीछा मत करो।
किसी की तस्वीर बिना अनुमति मत खींचो।
किसी लड़की के कपड़ों को उसकी उपलब्धता मत समझो।
और सबसे जरूरी—अपनी सीमा मत लांघो।
अगर संस्कार सिखाने हैं तो दोनों को सिखाइए।
“सारे मर्द एक जैसे हैं”—क्या यही संदेश है?
नहीं।
अच्छे पुरुष इस गुस्से को अपने खिलाफ आरोप मानने के बजाय उसके पीछे छिपे दर्द को समझ सकते हैं।
क्योंकि किसी लड़की का आक्रोश अक्सर किसी एक पुरुष के खिलाफ नहीं, बल्कि उन अनुभवों का परिणाम होता है जिनमें उसे बार-बार अपनी स्वतंत्रता की कीमत चुकानी पड़ी।
एक लड़की जब कहती है कि उसे डर लगता है, तो उसे बहस में हराने की नहीं, पहले सुनने की जरूरत है।
जब वह कहती है कि रास्ते में उसे घूरा गया, पीछा किया गया या छुआ गया, तो पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “तुम वहां गई क्यों थीं?”
पहला सवाल होना चाहिए—“उसने ऐसा किया क्यों?”
यहीं सोच बदलने की जरूरत है।
पिता और भाई का सवाल
कुछ लोग कहते हैं—“तुम्हारे पिता और भाई भी तो मर्द हैं।”
बिल्कुल हैं।
लेकिन किसी रिश्ते में होना किसी व्यक्ति को अपराधी या निर्दोष तय नहीं करता। असली सवाल व्यवहार का है।
एक पिता अपनी बेटी को सुरक्षा देना चाहता है, लेकिन क्या वह यही नहीं चाहेगा कि उसकी बेटी बिना डर के जी सके?
एक भाई अपनी बहन की रक्षा करना चाहता है, लेकिन क्या वह यह नहीं चाहेगा कि उसकी बहन को हर कदम पर किसी की निगरानी की जरूरत ही न पड़े?
और एक अच्छा पुरुष यह समझ सकता है कि महिलाओं की आजादी उसके खिलाफ नहीं है।
लड़की का स्वतंत्र होना पुरुष की हार नहीं है।
कपड़ों से चरित्र तय करने वाली सोच
जब किसी लड़की के कपड़ों को देखकर उसके चरित्र पर सवाल उठाया जाता है, तो समस्या कपड़ों में नहीं, नजर में है।
किसी के कपड़े किसी दूसरे व्यक्ति को उसे छूने, परेशान करने या अपमानित करने का अधिकार नहीं देते।
इसीलिए यह कहना कि “वह ऐसे कपड़े पहनकर बाहर निकली थी” अपराध का कारण नहीं, अपराध को सही ठहराने की कोशिश बन जाता है।
और यही बात लड़कियों को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाती है।
वे सिर्फ घटना से नहीं लड़ रही होतीं, घटना के बाद मिलने वाले सवालों से भी लड़ रही होती हैं।
सवाल सिर्फ आजादी का नहीं, बराबरी का है
लड़कियां यह नहीं मांग रहीं कि उन्हें समाज से अलग कोई विशेष अधिकार मिले।
वे वही चाहती हैं जो किसी भी इंसान की सामान्य जरूरत है—सम्मान, सुरक्षित वातावरण और अपनी जिंदगी के फैसले लेने की स्वतंत्रता।
उन्हें रात में बाहर जाने पर अपराधी की तरह पूछताछ नहीं चाहिए।
उन्हें दोस्त बनाने पर चरित्र प्रमाणपत्र नहीं चाहिए।
उन्हें कपड़ों के लिए सफाई नहीं देनी।
उन्हें यह साबित नहीं करना कि वे “अच्छी लड़की” हैं।
उन्हें सिर्फ इंसान की तरह देखा जाना है।
पुरानी बंदिशों की ओर लौटना समाधान नहीं
समाज में समय-समय पर महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर पुराने आदर्शों और परंपराओं की चर्चा होती रही है। कुछ लोग महिलाओं की भूमिका को पुराने सामाजिक ढांचे में सीमित करने की वकालत करते हैं, तो दूसरी ओर महिलाएं अपने अधिकारों और बराबरी की बात करती हैं।
लेकिन एक बात पर गंभीरता से विचार होना चाहिए—
अगर किसी समाज में महिलाओं को सुरक्षित रखने का सबसे आसान तरीका उनकी आवाजाही, कपड़ों, शिक्षा या स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाना माना जाए, तो क्या समस्या का समाधान हुआ या सिर्फ जिम्मेदारी का बोझ बदल दिया गया?
सुरक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें लड़की को अपनी जिंदगी छोटी न करनी पड़े।
अब सवाल लड़कियों से नहीं, समाज से है
लड़कियां सड़कों पर इसलिए नहीं हैं कि उन्हें पुरुषों से नफरत है।
वे इसलिए मुखर हैं क्योंकि लंबे समय से उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए खुद को बदलने की सलाह दी जाती रही है।
अब वे पूछ रही हैं—
हम क्यों बदलें?
गलत नजर वाला क्यों नहीं बदले?
पीछा करने वाला क्यों नहीं रुके?
बिना सहमति छूने वाला क्यों नहीं समझे?
बिना अनुमति तस्वीर लेने वाला क्यों नहीं शर्मिंदा हो?
और अपराध के बाद सवाल लड़की से ही क्यों किए जाएं?
यह सवाल सिर्फ महिलाओं का नहीं है।
हर उस पुरुष का भी है जो चाहता है कि उसकी बेटी, बहन, पत्नी या दोस्त बिना डर के जी सके।
क्योंकि लड़ाई “सारे मर्दों” से नहीं है।
लड़ाई उस मानसिकता से है जो लड़की की आजादी को खतरा समझती है, लेकिन उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर डाल देती है।
और शायद अब वक्त आ गया है कि लड़कियों से सिर्फ यह कहना बंद किया जाए—“संभलकर जाना।”
लड़कों से भी कहा जाए—
“अपनी सीमा पहचानो। सामने वाला इंसान है, तुम्हारी जागीर नहीं।”
यही बदलाव उस दिन शुरू होगा, जब किसी लड़की के घर से निकलने पर पहला सवाल यह नहीं होगा कि “कहां जा रही हो?”
बल्कि उसका अधिकार होगा कि वह कह सके—
“जहां जाना है, जा रही हूं… और सुरक्षित लौटना मेरा भी उतना ही अधिकार है।”