उप-राष्ट्रपति चुनाव का 786 अंक वाला सत्ता-शास्त्र: क्या NDA का पलड़ा भारी है या विपक्ष के पास है कोई चाल?
लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
“राजनीति केवल संख्या का खेल नहीं होती, यह इच्छाशक्ति, रणनीति और समय की समझ का युद्ध होती है।”
देश की राजनीति में एक बार फिर 786 की चर्चा तेज़ है, लेकिन इस बार न किसी धार्मिक प्रतीक के रूप में, न किसी फिल्मी शैली में, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक पद “उप-राष्ट्रपति” के चुनावी गणित के संदर्भ में।
क्या है 786 का खेल?
उप-राष्ट्रपति का चुनाव लोकसभा और राज्यसभा के सभी निर्वाचित और मनोनीत सांसदों द्वारा किया जाता है। वर्तमान में:
लोकसभा में 543 सीटों में से 1 खाली है, यानी कुल 542 सांसद
राज्यसभा में 4 नामित सदस्यों सहित कुल 244 सदस्य
कुल मिलाकर वोटिंग के लिए 786 सांसद
किसी उम्मीदवार को विजयी होने के लिए चाहिए 394 वोट (यानी बहुमत)।
NDA के पास फिलहाल क्या है?
एनडीए के पास दोनों सदनों को मिलाकर लगभग 422 सांसदों का समर्थन है। इसमें शामिल हैं:
भाजपा के सांसद कुछ सहयोगी दल जैसे जेडीयू, शिवसेना (शिंदे गुट), एलजेपी, और अन्य क्षेत्रीय दलों का समर्थन
कुछ निर्दलीय और छोटे दल जो समयानुसार NDA के साथ वोट करते हैं
इससे यह स्पष्ट है कि NDA फिलहाल आरामदायक बहुमत की स्थिति में है।
लेकिन क्या इतना आसान है खेल?
संख्या चाहे जितनी भी स्पष्ट दिखे, राजनीति में संख्या स्थिर नहीं होती — वह स्थिति, संवेदना और रणनीति से नियंत्रित होती है। विपक्ष अभी भी दो रणनीतियों पर काम कर सकता है:
नैतिक लड़ाई — एक प्रतिष्ठित, गैर-विवादास्पद चेहरा खड़ा करके देश को यह संदेश देना कि विपक्ष वैचारिक धरातल पर खड़ा है।
संकट मोचन कार्ड — कुछ ऐसे NDA सहयोगी दलों को साधने की कोशिश जो हाल के महीनों में असंतुष्ट नजर आए हैं।
इस्तीफे की पृष्ठभूमि और संदर्भ
इस चुनावी चर्चा को हवा देने वाला बड़ा घटनाक्रम रहा है वर्तमान उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा। भले ही यह इस्तीफा अभी तकनीकी पुष्टि की प्रक्रिया में हो, लेकिन यह इशारा करता है कि
या तो NDA एक बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करने जा रहा है या कोई ऐसा राजनीतिक संकट या पुनर्गठन आने वाला है जो सत्ता के समीकरणों को प्रभावित करेगा जगदीप धनखड़ जो पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के तौर पर अपने आक्रामक रवैये के लिए जाने गए थे, फिर उप-राष्ट्रपति के रूप में शालीनता और गरिमा का मिश्रण बने, उनका जाना एक युग के अंत जैसा है।
क्या विपक्ष के पास है कोई ट्रम्प कार्ड?
हालांकि संख्याओं में विपक्ष पीछे है, लेकिन अगर वह एकता बनाए रखता है जनभावना आधारित चेहरा प्रस्तुत करता है
NDA के भीतर के असंतोष को रणनीतिक ढंग से उभारता है तो यह चुनाव अनपेक्षित मोड़ ले सकता है।
लोकतंत्र का असली परीक्षण
इस पूरे घटनाक्रम में असली सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि क्या देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर योग्यतम और गरिमामयी व्यक्तित्व चुने जाएंगे?
क्या यह चुनाव सत्ता का विस्तार भर बनकर रह जाएगा या कोई वैचारिक संदेश भी देगा?
786 सिर्फ एक संख्या नहीं है, यह लोकतंत्र का प्रतीक है — जहां संसद के 786 प्रतिनिधि यह तय करेंगे कि भारत का अगला उप-राष्ट्रपति कौन होगा।
लेकिन इस बार यह निर्णय केवल राजनीतिक अंकगणित नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना, गरिमा और भविष्य की दिशा को भी परिभाषित करेगा।
“अगर लोकतंत्र केवल बहुमत से चलना होता, तो संसद में विपक्ष की ज़रूरत ही नहीं होती। लेकिन लोकतंत्र का सौंदर्य यही है कि वह हर संख्या के पीछे छिपे विचार को सुनता है।”
