लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
कोमल अरन अटारिया
निर्देशक,लेखक,साहित्यकार, मुंबई

इस जीवन के आरम्भ और अंत और उसके बाद तक अगर हमारे साथ कुछ रहता है तो वो सिर्फ और सिर्फ अध्यात्म है लेकिन अधिकतर लोग इसे समझ नहीं पाते हैं कई लोगों को तो अध्यात्म का सही अर्थ भी नहीं पता होता है वो तो बस भेड़ चाल जैसी बला के इर्द गिर्द घूमते हुए ये समझते हैं कि बस उस पहली भेड़ की राह का अनुसरण करते हुए वो अपना जीवन सफल बना लेंगें यही उनको समझाया गया है उन सभी को मृत्यु के बाद क्या होगा इससे कुछ लेना देना नहीं है अब बहुत से लोग ये कहेंगें की पहले ये बताओ की।
जीवन के आरंभ में अध्यात्म कैसे आया? तो उन सभी के लिए ये जान लेना अति आवश्यक है की जब शिशु माँ के गर्भ में होता है तो वो ध्यान मग्न होता है वो अपनी आत्मा को जानने का प्रयास करता है अपनी माँ की हर प्रतिक्रिया पर उसका ध्यान होता है क्योंकि उसके लिए वो ही परम आत्मा है इसलिए सामान्यतः वो अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक अपनी जननी से ही अधिक जुड़ा हुआ होता है इसलिए माँ का अपने शिशु और शिशु का अपनी माँ से ये आध्यत्मिक सम्बन्ध सदैव जीवन के उच्च स्तर पर रहता है ऐसा नहीं कि ये सम्बन्ध किसी और के साथ स्थापित नहीं हो सकता पर उसे प्रेम और मोह के रिश्तों की मान्यता ज्यादा मिलती है| मनुष्य अगर अपने ध्यान के स्तर को बढ़ाते हुए अपनी आत्मा को दूसरी आत्मा या परमात्मा से जोड़ने का प्रयत्न करता है तो अपने जीवन के अंत के पश्चात भी वो सहजता से उस यात्रा को अकेला ही पूर्ण कर सकता है आजकल इसीलिए अपार जनसमूह धार्मिक स्थानों और कई संत महात्माओं के यहाँ अपनी-अपनी आध्यत्मिक यात्रा को पूर्ण करने के लिए आतुर है पर क्या वास्तव में उनकी ये यात्राएं सात्विक उद्देश्य की पूर्ति कर पा रही है? या अभी भी वो भेड़ों के समूह में ही हैं जितना मैं समझ पाया हूँ।
अधिकतर मनुष्य अपनी सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए कोई ना कोई अवसर खोज रहा है शायद इन्ही अवसरों में से एक उनकी ये यात्राएं हो सकती हैं क्योंकि कई बार ऐसा भी होता है कि अगर हम अपनी आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने के लिए किसी संत या किसी धार्मिक स्थल पर जा रहे हैं| तो उसके पास ही बसे एक पर्यटन स्थल पर भी घूम लिया जाये हम ऐसा विचार करते हैं क्या ऐसी यात्राओं को किसी विशेष कर्म को करने की यात्रा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? मेरी दृष्टि में तो बिल्कुल भी नहीं और ये बात मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मेरा एक मित्र आने वाली 15 जून को बाबा नीब करोरी स्थल पर जाना चाहता है जिसे वहां एक पर्व के रूप में हर साल मनाया जाता है और बाबा नीब करोरी से कुछ किलोमीटर दूर नैनीताल भी घूमने जायेगा उसका ये तर्क है कि दोनों कार्य एक साथ हो जायेंगें, मैं तो बस इतना जानना चाहता हूँ की जब आप बाबा के पास आध्यात्मिक चेतना का सम्बन्ध बनाने जा रहे हो तो इस जुड़ाव के बाद तो कुछ भी शेष नहीं रह जाता, तो फिर आप कैसे अपने मन की किसी सांसारिक इच्छा की पूर्ति के लिए कोई और कार्य करते हुए अपने आपको ही भ्रमित कर रहे हो ।
ऐसा भी नहीं है कि कोई दो कार्य एक साथ नहीं हो सकते हैं पर आपको किसी एक सच्चाई को स्वीकार करना होगा या तो सिर्फ आध्यामिकता की यात्रा या सिर्फ सैर के लिए किसी मनमोहक स्थान पर जाना और अगर सच में आपकी श्रद्धा में सात्विकता है तो सबसे पहले ये भी जान लेना होगा की बाबा नीब करोरी से आप किस प्रकार जुड़ पायेंगें क्योंकि अब वहां वो किसी मानव शरीर में नहीं हैं उनका आश्रम जिसे कैंची धाम के रूप में जाना जाता है वहां वे मूर्ति के स्वरुप में विराजमान हैं| क्या आप अपने मन को उनसे जोड़ पायेंगें? और क्या आपको उनसे आध्यात्मिक रूप से जुड़ने की विधि पता है? ये आपको जान लेना चाहिए अब आप कहेंगें की ये हमें कौन बतायेगा? इस पर मैं ये कहना चाहूँगा की आपको किसी की जरुरत नहीं है उनसे सम्बन्ध स्थापित करने के लिए बस, जब आप उनके स्थान पर होंगें तो अपने मन के विचारों का मूल्यांकन स्वयं आपको ही करना होगा ।
जैसे आज विश्व प्रसिद्द एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स ने भारत की अपनी आध्यात्मिक यात्रा के दौरान 1974 में बाबा नीब करोरी आश्रम पर अपने विचारों में गतिशीलता लाते हुए अपने जीवन और व्यापार को उच्च स्तर पर ले जाने के लिए किया था और बाद में स्टीव जॉब्स के ही कहने पर मार्क जुकरबर्ग जो आज फेस बुक और अन्य कई सोशल मीडिया प्लेटफार्म व अन्य कई व्यवसायों के लिए सफलतम व्यक्तियों की श्रेणी में से विश्वभर में जाने जाते हैं उन्होंने भी बाबा नीब करोरी के दिए विचारों से ही अपने विचारों को सशक्त किया था इसके अलावा कई और भी रहस्यपूर्ण घटनाओं ने बाबा नीब करोरी को अध्यात्म की युक्ति के रूप में प्रसिद्द कर दिया मैं बस आपसे यह कहना चाहता हूँ कि अगर आप बाबा के स्थान पर जा रहे हैं तो किसी चमत्कार की उम्मीद मत कीजियेगा बल्कि अपने विचारों को उनसे जोड़ने का प्रयास कीजियेगा वो आपके सही कर्म का मार्ग आपको देंगें आप ही के माध्यम से बस आपको स्वयं को उस विचार पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है यह मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर आपसे कह रहा हूँ बाबा सिर्फ विचार देंगें पर कर्म तो आपको ही करना होगा| एक भेड़ भेड़ों के झुण्ड से अलग होकर या तो मार्ग भटक सकती है या कोई नया मार्ग अन्य लोगों के लिए भी बना सकती है अब ये तो उस भेड़ की मानसिकता और उसके विचारों पर निर्भर करता है की वो अपने जीवन में कौन सा मार्ग चुनना चाहती है मेरा मानना है की अध्यात्म की युक्ति का विचार लेकर अगर बाबाके पास जाया जाये तो यक़ीनन बाबा नीब करोरी एक विचार अवश्य ही देंगें। अब ये तो हम पर निर्भर करता है की उस विचार का हम कैसे उपयोग करते हैं संत महात्मा या कोई भी धार्मिक स्थल चमत्कार नहीं करता बल्कि आपकी चेतना का ही उपयोग करते हुए आपको मार्ग दिखाता है। इस मार्ग की अदृश्यता को दृश्यता में लाने का काम हमको ही करना होगा भले ही हम अपनी धार्मिक यात्रा को किसी और मनोरंजन यात्रा से जोड़ लें, पर जिस यात्रा का जो उद्द्देश्य है उसे सत्यता के साथ स्वीकारें या तो पूर्ण अध्यात्म या फिर कुछ और?
मैंने इस लेख के आरंभ में कहा था कि अध्यात्म ही जीवनकाल में और मृत्यु के पश्चात भी साथ रहेगा एक सफल विचार जो स्वयं के साथ- साथ मानव कल्याण के लिए भी उपयोगी हो उसे केवल अपने सांसारिक हितों से ना जोड़ा जाये और शायद बाबा नीब करोरी भी यही चाहते होंगें इसलिए आज उनके स्थान पर जन समूह उमड़ रहा है| वो तो देने को तैयार हैं बस उनका सात्विक विचार कौन-कौन लेना चाहता है ये तो हम पर निर्भर करता है उनकी दी हुई अध्यात्म की युक्ति का उपयोग कब और कैसे करना है?






































