लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
अहसास की कलम से

अतुल जैन अहसास
**वंदे मातरम् के 150 साल
वंदे मातरम्...
दो शब्द, लेकिन इनमें समाया एक पूरा भारत।
एक ऐसा गीत जो स्वतंत्रता आंदोलन की सांसे बना, जिसने साम्राज्यवादी सत्ता को असहज किया, जिसने युवा दिलों को मौत से भी बेखौफ कर दिया। सवाल यह है कि 150 साल बाद भी क्या यह गीत हमारे भीतर उसी ताप के साथ जलता है?
गीत जब आवाज़ बना क्रांति की
1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने आनंदमठ में “वंदे मातरम्” लिखा।
यह कविता नहीं, राष्ट्र-चेतना की पहली लपट थी।
“माँ” इस गीत में मिट्टी भी थी, भूमि भी, और संस्कृति की अविनाशी धुरी भी।
1905 के बंग-भंग आंदोलन में यह गीत सड़कों की धड़कन बन गया।
हाथों में हथियार नहीं थे, लेकिन होंठों पर “वंदे मातरम्” था, और वही उनका प्रतिरोध बन गया। यही सामर्थ्य इस गीत की विरासत है।
आज़ादी के बाद… सम्मान बचा, आत्मा फंस गई
आज़ादी आई, देश बदला।
लेकिन “वंदे मातरम्” को वह स्थान नहीं मिला जिसकी इसकी आत्मा हकदार थी।
राजनीति ने इसे अपने हिसाब से बांटा, इस्तेमाल किया, फिर दरकिनार भी किया।
राष्ट्रगान के रूप में “जन गण मन” चुना गया।
राष्ट्रगीत बना “वंदे मातरम्”, और धीरे-धीरे यह समारोहों की दीवारों में सीमित होता गया।
150 साल बाद आज वही भारत,
जो कभी “माँ” को नमन करता था,
अब उसी माँ की नदियों को जहर से भरता है, जंगलों को नीलाम करता है, मिट्टी को मुनाफे में बदल देता है।
हम “वंदे मातरम्” गाते हैं,
लेकिन उत्सव खत्म होते ही प्लास्टिक में लिपटा तिरंगा सड़क पर पड़ा मिलता है।
हम “भारत माता की जय” बोलते हैं,
लेकिन किसान की मौत पर खामोश रह जाते हैं।
नारा बनाम नैतिकता
वक्त ने इस गीत को जोड़ने वाली शक्ति से ज्यादा, राजनीतिक ध्रुवीकरण का औज़ार बना दिया है।
जो इसे पूरी आवाज़ से बोल दे, वह राजनीतिक बैनर का मोहरा कहा जाता है।
जो न बोले, वह देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है।
कभी यह गीत एकता का प्रतीक था।
आज बहस का ईंधन बना दिया गया है।
कभी इससे लोग जुड़ते थे,
आज इससे वोट जोड़े जाते हैं।
और फिर भी… उम्मीद सांस लेती है
फिर भी, इस गीत की आत्मा पूरी तरह बुझी नहीं है।
जब किसी स्कूल के प्रांगण में बच्चों की आवाज़ में इसका स्वर गूंजता है,
जब किसी शहीद की विदाई पर “वंदे मातरम्” हवा में तैरता है,
जब कोई किसान मिट्टी को माथे से लगाता है,
तो लगता है, यह गीत अभी भी हमारे भीतर है।
जब तक इस धरती पर कोई बेटा अपनी माँ के लिए खड़ा है,
जब तक कोई हाथ तिरंगे को ऊंचा उठाने की हिम्मत रखता है,
तब तक “वंदे मातरम्” सिर्फ़ गीत नहीं,
भारत की आत्मा रहेगा।
देशभक्ति शब्द नहीं — जिम्मेदारी है
150 सालों का यह सफर हमें याद दिलाता है कि देशभक्ति भाषण नहीं, कर्म है।
अगर सचमुच हम “माँ” के कर्ज़दार हैं,
तो उसकी ऋण मुक्ति गीतों से नहीं,
उसकी मिट्टी, उसके जंगल, उसकी नदियों, और उसके लोगों को बचाकर होगी।
वंदे मातरम्।
केवल जुबां से नहीं,
ज़मीर से भी।








































