लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
शौर्य चक्र विजेता शहीद भागीरथ कड़वासरा की बेटी की शादी में बने पिता
मेड़ता सिटी, नागौर। नागौर जिले के मेड़ता उपखंड के निकट ग्राम पंचायत कड़वासरो की ढाणी में रविवार को एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला। 13 ग्रेनेडियर्स के जवान अपने शौर्य चक्र विजेता शहीद साथी भागीरथ कड़वासरा से किया वादा निभाने उनकी पुत्री की शादी में पहुंचे और पिता की भूमिका निभाते हुए सभी रस्में अदा कीं।
शहीद भागीरथ कड़वासरा की पुत्री सुष्मिता के विवाह समारोह में 13 ग्रेनेडियर्स (गंगानगर-जैसलमेर सेक्टर) के 24 जवान विशेष रूप से गांव पहुंचे। इस दौरान कमान अधिकारी कर्नल सोमेन्द्र कुमार, अन्य सैन्य अधिकारी तथा सेवानिवृत्त अधिकारी कर्नल सुरेश चंद्र राणा भी उपस्थित रहे।
जवानों ने अपने शहीद साथी के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए बेटी की शादी में पिता के रूप में पारंपरिक रस्में निभाईं और उसे आशीर्वाद दिया। विदाई के समय जवानों की आंखें नम हो गईं। इस भावुक पल को देखकर गांव के लोग भी भावविभोर हो उठे। ग्रामीणों ने कहा कि जब लोग अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से भी पीछे हट जाते हैं, ऐसे समय में सेना के जवानों द्वारा निभाई गई यह जिम्मेदारी सच्ची देशभक्ति और पारिवारिक मूल्यों का अद्भुत उदाहरण है।
अदम्य साहस के प्रतीक थे शहीद भागीरथ कड़वासरा
“जो देश पर मिटे, वही अमर कहलाए” — इस पंक्ति को चरितार्थ करने वाले शौर्य चक्र विजेता अमर शहीद भागीरथ कड़वासरा की वीरता आज भी क्षेत्रवासियों के लिए प्रेरणा बनी हुई है।
8 जून 2002 को असम के मिलनपुर गांव में आतंकवादियों के खिलाफ चलाए गए एक सैन्य अभियान के दौरान उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए देश की रक्षा में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उनकी शहादत ने पूरे क्षेत्र को गौरवान्वित किया।
1978 में जन्म, 1995 में सेना में भर्ती
भागीरथ कड़वासरा का जन्म 10 जनवरी 1978 को नागौर जिले के मेड़ता उपखंड स्थित कड़वासरो की ढाणी में हुआ था। उनके पिता हप्पाराम एवं माता मंगली देवी हैं। उनका विवाह टालनपुर निवासी पूराराम बांगड़ा की पुत्री संतोष के साथ हुआ था। शहीद अपने पीछे एक पुत्री सुष्मिता को छोड़ गए।
5 जनवरी 1995 को उनका चयन भारतीय सेना की 13 ग्रेनेडियर्स बटालियन में हुआ। उन्होंने अपने सैन्य जीवन का अधिकांश समय देश के पूर्वी क्षेत्र में सेवा करते हुए बिताया। उनकी वीरता और अद्वितीय साहस को सम्मान देते हुए 26 मार्च 2003 को भारत सरकार द्वारा उन्हें मरणोपरांत ‘शौर्य चक्र’ से सम्मानित किया गया।
शहीद की बेटी की शादी में सेना के जवानों की यह उपस्थिति न केवल एक वादा निभाने का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि भारतीय सेना अपने साथियों और उनके परिवारों को कभी अकेला नहीं छोड़ती।
















































