हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय पत्रकारिता इस समय एक गहरे संक्रमण काल से गुजर रही है। यह केवल संक्रमण नहीं, स्वयं पत्रकारिता का संक्रमित हो जाना है — एक ऐसा कालखंड जिसमें सत्य के प्रहरी स्वयं संदेह के घेरे में आ गए हैं। खासकर टेलीविजन पत्रकारिता एक गंभीर रोग से ग्रसित प्रतीत होती है, जिसमें शोर को संवाद और सनसनी को समाचार मान लिया गया है।
मूल उद्देश्य से विचलन
पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता से सवाल करना, जनभावनाओं को स्वर देना, और लोकतंत्र को चेतना प्रदान करना रहा है। लेकिन आज अधिकांश चैनलों पर ‘डिबेट’ नहीं, ‘ड्रामे’ होते हैं; रिपोर्टिंग नहीं, ‘राय का थोपना’ होता है। एंकर अब पत्रकार नहीं, एक विचारधारा के प्रचारक दिखते हैं। खबरों की प्राथमिकता अब TRP और स्पॉन्सरशिप तय करते हैं — न कि जनहित।
चौथे स्तंभ की दरकती दीवारें
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन जब यह स्तंभ ही दलालों, पूंजीपतियों और राजनीतिक आकाओं के आगे झुकने लगे, तो लोकतंत्र की इमारत भी डगमगाने लगती है। यह चिंताजनक है कि निष्पक्ष पत्रकारिता अब एक ‘जोखिम भरा कार्य’ माना जाता है। जो पत्रकार सच बोलते हैं, वे या तो संस्थानों से बाहर कर दिए जाते हैं या उन्हें ‘एंटी-नेशनल’, ‘साजिशकर्ता’, या ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ का सदस्य घोषित कर दिया जाता है।
डिजिटल मीडिया की उम्मीद
इस अंधकार में कुछ रोशनियों की किरणें भी हैं। कुछ स्वतंत्र मीडिया हाउस, यूट्यूब चैनल्स, और वैकल्पिक पत्रकार प्लेटफॉर्म्स अब भी निडरता से सच्चाई की रिपोर्टिंग कर रहे हैं। सोशल मीडिया ने एक सीमित लेकिन मजबूत लोकतांत्रिक मंच दिया है जहाँ आम जनता भी सवाल पूछ रही है। हालाँकि, यहाँ भी फेक न्यूज़, एजेंडा और ट्रोल आर्मी जैसे खतरे हैं।
पाठकों की भूमिका
एक सजग पाठक ही पत्रकारिता को दिशा दे सकता है। यदि दर्शक TRP आधारित ‘तमाशे’ को नकारें और गंभीर, तथ्यपूर्ण पत्रकारिता को बढ़ावा दें, तभी मीडिया का चरित्र बदलेगा। क्योंकि लोकतंत्र में मीडिया की गुणवत्ता केवल पत्रकारों की नहीं, पाठकों की चेतना का भी प्रतिबिंब होती है।
साधुवाद और शुभकामनाएँ
जो मुट्ठीभर पत्रकार और मीडिया संस्थान आज भी निष्पक्ष, निर्भीक और निडर पत्रकारिता की मशाल थामे खड़े हैं—उन्हें साधुवाद। वे ही इस संक्रमित दौर में पत्रकारिता के पुनर्जागरण के वाहक बन सकते हैं।
उम्मीद अभी शेष है…
भारतीय पत्रकारिता के लिए यह समय एक ‘क्राइसिस’ भी है और एक ‘चुनाव’ भी। या तो यह चौथे स्तंभ के रूप में खुद को पुनः स्थापित करेगी, या सत्ता का प्रचारतंत्र बनकर इतिहास में गुम हो जाएगी। हमें चुनना है कि हम किस पत्रकारिता का समर्थन करते हैं।
