संजा पर्व: विवाह व सुयोग्य वर की कामना से मनाया जाने वाला लोक उत्सव

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

 

झालावाड़, चौमहला ।
मध्य प्रदेश और राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा संजा पर्व आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से मालवा, निमाड़ तथा राजस्थान के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है और श्राद्ध पक्ष के दौरान पूरे 16 दिनों तक चलता है। अविवाहित कन्याएँ भगवान शिव व माता पार्वती की पूजा कर अच्छे, सुयोग्य वर और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।

पर्व के दौरान गोबर, फूल और पत्तियों से विशेष आकृतियाँ प्रतिदिन तिथि के अनुसार दीवार पर बनाकर संजा देवी का पूजन किया जाता है। शाम होते ही कन्याओं की टोली एक-दूसरे के घर जाकर संजा माता के पारंपरिक गीत गाती है, आरती करती है और प्रसाद का वितरण करती है। अंतिम दिन किलाकोट नामक आकृति बनाई जाती है जिसमें चंद्रमा, सूरज, हाथी तथा संजा माता को गाड़ी में सवार दिखाया जाता है। साथ ही जाड़ी जसोदा, पतली पेमा, भाई-बहन, डोकर, डोकरी जैसी आकृतियाँ फूलों और चमकीली पन्नियों से सजाई जाती हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व को बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। संजा माता को ज्ञान और देवी स्वरूप माना जाता है। यह पर्व भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलता है और लोकजीवन में सामूहिक सहभागिता का उत्सव बन जाता है।

हालाँकि, आज डिजिटल युग में इस पर्व की परंपरा लुप्त होती जा रही है। गोबर से बनाई जाने वाली संजा आकृतियों की जगह कागज के फोटो और पोस्टर ने ले ली है। शिक्षा, शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के चलते युवाओं में पारंपरिक रीति-रिवाजों के प्रति उत्साह घट रहा है, जिससे इस लोक पर्व का अस्तित्व संकट में है।

लोक संस्कृति और ग्रामीण धरोहर के रूप में संजा पर्व को संरक्षित करने की आवश्यकता है। समाज, विद्यालयों, स्थानीय प्रशासन और सांस्कृतिक संस्थाओं को मिलकर इस अमूल्य परंपरा को बचाने का प्रयास करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी जड़ों से जुड़ी रह सकें।

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