राजस्थान के न्याय योद्धा
वकीलों की समस्याएँ और सरकार से न्यायपूर्ण अपील
लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
“अगर न्याय मंदिर है, तो वकील उसके दीपस्तंभ हैं। लेकिन जब दीप खुद बुझने लगे, तो उजाला कौन करेगा?”
राजस्थान के हर ज़िले, हर तहसील, हर अदालत परिसर में दिन-रात न्याय की लौ जलाने वाले वकील (Advocates) आज खुद असहाय, उपेक्षित और असंतुलित व्यवस्था के शिकार हो गए हैं। बार काउंसिल की गरिमा, अधिवक्ताओं की सुरक्षा, उनके भत्ते, सम्मानजनक कार्यप्रणाली और सरकार से सहयोग — सब कुछ आज एक गहरे संकट में है।
वकील समुदाय की प्रमुख समस्याएँ वकीलों के लिए कोई सुरक्षा कानून नहीं
कोर्ट परिसरों में आए दिन वकीलों पर हमले, दुर्व्यवहार और मानसिक दबाव की घटनाएँ होती हैं। डॉक्टरों के लिए सुरक्षा अधिनियम है, लेकिन वकीलों के लिए अब तक कोई विशिष्ट अधिनियम लागू नहीं किया गया है।
बीमा, पेंशन और भत्ते का अभाव
लाखों वकील वर्षों से न्याय व्यवस्था की सेवा कर रहे हैं, लेकिन न तो उनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा है और न ही नियमित आय की गारंटी।
सरकार द्वारा घोषित “Advocate Welfare Fund” में पारदर्शिता और न्यायसंगत वितरण की भारी कमी है।
बुनियादी सुविधाओं की घोर कमी
अधिकांश तहसील कोर्ट में बार रूम, पुस्तकालय, इंटरनेट, शुद्ध पेयजल, बैठने की व्यवस्था तक नहीं है।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं के लिए विश्रामगृह और महिला वकीलों के लिए सुरक्षित सुविधाएँ नगण्य हैं।
अधिकारियों और सरकार का उपेक्षापूर्ण रवैया
न्यायिक अधिकारियों द्वारा वकीलों के साथ दुव्यवहार और दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ रही हैं। सरकार वकीलों की मांगों को सामाजिक या लोकतांत्रिक मुद्दों की बजाय हड़ताल या दबाव का हथियार मानकर नजरअंदाज़ कर देती है।
युवा वकीलों के लिए कोई ठोस अवसर नहीं हर साल लॉ कॉलेजों से निकलने वाले हज़ारों युवा वकीलों के लिए न तो स्टाइपेंड है, न स्कॉलरशिप और न ही कोई ट्रेनिंग योजना।
पहली पीढ़ी के वकील अक्सर आर्थिक असुरक्षा के कारण न्याय व्यवस्था को अलविदा कह देते हैं।
सरकार से न्यायपूर्ण, अपील:
“वकील सुरक्षा अधिनियम” को अविलंब लागू किया जाए ताकि कोर्ट परिसर में वकीलों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।
राजस्थान अधिवक्ता बीमा योजना को दोबारा क्रियाशील और सशक्त बनाया जाए।
युवा वकीलों को 5 वर्षों तक मासिक सहायता/स्टाइपेंड दिया जाए ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
प्रत्येक ज़िले और तहसील में आधुनिक बार भवन, वकील विश्रामगृह, डिजिटल सुविधा, पुस्तकालय और वाई-फाई की व्यवस्था अनिवार्य की जाए।
लाखों वकीलों को फ्री स्वास्थ्य बीमा योजना और चिकित्सा सहायता मिले — ताकि वह खुद और उनका परिवार सामाजिक सुरक्षा से वंचित न रहे।
बार काउंसिल और सरकार के बीच एक स्थायी संवाद समिति बने जो समय-समय पर समस्याओं को हल करे।
वकील केवल पेशेवर नहीं — न्याय की आत्मा हैं। उन पर हमला करना, या उन्हें अनदेखा करना, दरअसल लोकतंत्र की रीढ़ पर प्रहार करना है। अगर आज हम अपने “न्याय योद्धाओं” की आवाज़ नहीं सुनेंगे, तो कल न्याय की ज़ुबान भी चुप हो जाएगी।



















































