लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी, संपादक – लोकटुडे
“2.5 अरब वर्षों का गणना-कार्य केवल 4 मिनट में!”
यह वाक्य विज्ञान कथा नहीं, बल्कि आज की वैज्ञानिक उपलब्धि है। चीन द्वारा विकसित किए गए इस अद्वितीय क्वांटम कंप्यूटर ने न केवल तकनीक की दुनिया में तहलका मचा दिया है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मानव सभ्यता अब एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है — एक ऐसा युग जहां कल्पनाएं सीमित हैं, पर तकनीक नहीं।
क्वांटम कंप्यूटर क्या है?
पारंपरिक कंप्यूटर जहां बिट्स (0 या 1) के आधार पर काम करते हैं, वहीं क्वांटम कंप्यूटर “क्यूबिट्स (qubits)” के माध्यम से कार्य करता है, जो एक साथ 0 और 1 दोनों हो सकते हैं — यानी सुपरपोजिशन और एंटैंगलमेंट जैसी क्वांटम भौतिकी की अवधारणाओं का उपयोग कर यह एक साथ कई गणनाएं कर सकता है। यही कारण है कि एक क्वांटम कंप्यूटर एक साथ अरबों समीकरणों को हल करने में सक्षम हो जाता है।
चीन की छलांग: तकनीक में नेतृत्व का दावा
चीन ने यह तकनीक केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रखी, बल्कि उसका व्यावसायिक और सामरिक उपयोग करने की दिशा में ठोस प्रयास शुरू कर दिए हैं।
इस क्वांटम कंप्यूटर की क्षमता इतनी विशाल है कि जिस कार्य को सामान्य सुपरकंप्यूटर करने में अरबों वर्ष लगाते, उसे इसने 4 मिनट में हल कर दिया। यह प्रदर्शन “क्वांटम सुपरमैसी” का एक जीवंत उदाहरण है — जहां क्लासिकल कंप्यूटर के सामर्थ्य की सीमा समाप्त हो जाती है, वहीं से क्वांटम कंप्यूटिंग की शुरुआत होती है।
वैश्विक शक्ति-संतुलन पर प्रभाव
तकनीकी क्षेत्र में अमेरिका दशकों से अग्रणी रहा है, लेकिन चीन का यह कदम उसके एकाधिकार को सीधी चुनौती है। इस कंप्यूटर के माध्यम से:
साइबर सुरक्षा में अद्वितीय बढ़त मिलेगी,
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा के क्षेत्रों में चीन को वर्चस्व मिलेगा,
और रक्षा, अंतरिक्ष और जैव प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में असाधारण गति से विकास संभव होगा।
चीन की यह प्रगति सिर्फ उसकी वैज्ञानिक शक्ति नहीं, बल्कि उसकी वैश्विक कूटनीतिक रणनीति का भी हिस्सा है — “तकनीक में वर्चस्व, तो दुनिया में प्रभुत्व।”
भारत कहाँ खड़ा है?
भारत ने भी अपनी तैयारी शुरू कर दी है। सरकार ने हाल ही में ₹6,000 करोड़ के ‘राष्ट्रीय क्वांटम मिशन’ की घोषणा की है, जिसके तहत अगले आठ वर्षों में भारत को क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम कम्युनिकेशन और क्वांटम सेंसरिंग में आत्मनिर्भर बनाना है।
हालांकि, यह लड़ाई केवल बजट की नहीं है, यह प्रतिभा, अनुसंधान, और स्वतंत्र सोच की लड़ाई है।
भारत के पास IITs, IISc, DRDO और ISRO जैसे संस्थान हैं, लेकिन अभी जरूरत है उन्हें राजनीतिक इच्छाशक्ति, सतत वित्तीय समर्थन और वैश्विक साझेदारी के साथ जोड़ने की।
विज्ञान, दर्शन और समाज: एक नई सोच की ज़रूरत
जब हम ऐसी तकनीकी क्रांतियों की बात करते हैं, तो केवल विज्ञान की नहीं, बल्कि नैतिकता, दर्शन और सामाजिक दिशा की भी ज़िम्मेदारी जुड़ती है।
क्या हम इस तकनीक का उपयोग मानवता के कल्याण में करेंगे या इसका उपयोग निगरानी, हथियारों और नियंत्रण के लिए किया जाएगा?
इस प्रश्न का उत्तर विज्ञान नहीं, बल्कि समाज, नेतृत्व और जनमानस तय करेगा।
क्वांटम कंप्यूटर की यह छलांग हमें चेतावनी भी देती है और प्रेरणा भी।
चेतावनी — कि अगर हमने आज अनुसंधान और नवाचार को महत्व नहीं दिया, तो हम केवल दूसरों की बनाई दुनिया में जीने को मजबूर होंगे।
प्रेरणा — कि अगर हम चाहें, तो भारत अपने प्राचीन ज्ञान, वैज्ञानिक प्रतिभा और सांस्कृतिक विवेक से इस नवयुग का नेतृत्व कर सकता है।
क्वांटम युग आ चुका है। अब सवाल यह नहीं कि हम तैयार हैं या नहीं — सवाल यह है कि हम कितनी तेज़ी से अपने भविष्य को तय करते हैं।










































