“पिता की पुण्यतिथि या राजनीतिक संदेश? पायलट की गहलोत से मुलाकात के निहितार्थ”

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार

राजस्थान की राजनीति में हाल ही में घटित एक घटना ने फिर से चर्चाओं को तेज कर दिया है — जब कांग्रेस नेता सचिन पायलट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से उनके सरकारी निवास पर जाकर 11 जून को आयोजित होने वाले अपने पिता स्वर्गीय राजेश पायलट की पुण्यतिथि कार्यक्रम में शामिल होने का आमंत्रण देने पहुँचे।
देखने में यह एक सामान्य औपचारिक मुलाकात थी, लेकिन राजनीति की परतों में यह घटना कई संकेत छोड़ गई है, जिनका विश्लेषण करना आवश्यक है।

गहलोत बनाम पायलट — एक लम्बी खींचतान

राजस्थान कांग्रेस पिछले कई वर्षों से दो ध्रुवों में बंटी रही है — एक ओर अनुभवी नेता अशोक गहलोत, दूसरी ओर युवा और लोकप्रिय नेता सचिन पायलट।
2018 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के बाद पायलट समर्थकों को यह विश्वास था कि मुख्यमंत्री पद उन्हें मिलेगा, लेकिन पार्टी ने गहलोत को तृतीय बार यह जिम्मेदारी दी।
यह निर्णय पायलट और उनके समर्थकों के लिए राजनीतिक असंतोष की वजह बना और 2020 में यह असंतोष सार्वजनिक विद्रोह के रूप में सामने आया।

उस समय पायलट ने खुलेआम पार्टी के खिलाफ आवाज़ उठाई थी, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जैसे पदों से हटाया गया।
तब से अब तक, दोनों नेताओं के बीच कड़वाहट जगज़ाहिर रही है।

सामान्य औपचारिकता या रणनीतिक संवाद?

पायलट द्वारा गहलोत से व्यक्तिगत रूप से मिलकर आमंत्रण देना एक भावनात्मक और सांस्कृतिक दृष्टि से उचित कदम था — लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या राजनीति में भावनाएं इतनी सरल होती हैं?
विश्लेषकों की दृष्टि में यह मुलाकात एक संभावित ‘Ice-Breaker’ हो सकती है।

वर्तमान में, कांग्रेस के समक्ष राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक संकट, नेतृत्व परिवर्तन की चुनौतियां, और राज्यों में असंतोष की बाढ़ है।
ऐसे में राजस्थान जैसे बड़े राज्य में एकजुटता बनाए रखना पार्टी के लिए अत्यंत आवश्यक है।
यह मुलाकात उसी दिशा में एक ‘Soft Political Gesture’ भी हो सकती है — जिसमें दोनों गुट सार्वजनिक रूप से एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता और संवाद की कोशिश करते हुए दिखें।

राजेश पायलट की विरासत का राजनीतिक पुनर्स्मरण

राजेश पायलट न केवल एक एयरफोर्स अफसर से राजनेता बने व्यक्ति थे, बल्कि वे भारतीय राजनीति में एक साहसी और स्पष्टवक्ता नेता के रूप में जाने जाते हैं।
उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम वर्षों से आयोजित होता रहा है, और उसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता भाग लेते हैं।

लेकिन जब उनके पुत्र, जो स्वयं कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में गिने जाते हैं, अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री को आमंत्रण देने जाते हैं — तो यह एक व्यक्तिगत परंपरा से बढ़कर राजनीतिक प्रसंग बन जाता है।

यह पायलट द्वारा अपने पिता की राजनीतिक विरासत को फिर से सामने लाने और कांग्रेस में अपने वजूद को पुनर्स्थापित करने की कोशिश भी हो सकती है।

क्या यह कांग्रेस नेतृत्व की मध्यस्थता का असर है?

कांग्रेस हाईकमान, विशेषतः राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे, पिछले कुछ महीनों से राज्य इकाइयों में गुटबाज़ी खत्म करने की दिशा में सक्रिय हैं।
छत्तीसगढ़, पंजाब, और कर्नाटक के अनुभवों से सीखते हुए कांग्रेस अब राजस्थान में भी 2028 की तैयारी समय से करना चाहती है।

यह संभव है कि आलाकमान ने दोनों नेताओं को व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्तर पर संवाद की रणनीति अपनाने को कहा हो — जिसमें सचिन पायलट की ओर से पहला कदम इस मुलाकात के रूप में सामने आया हो।

राजनीतिक महत्व: 2028 की तैयारी या नेतृत्व परिवर्तन की भूमिका?

अब जब 2023 के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा की सरकार है, कांग्रेस के पास 2028 के लिए पर्याप्त समय है — परंतु इस समय का उपयोग तभी सार्थक हो सकता है जब संगठनात्मक एकता और नेतृत्व की स्पष्टता हो।

सचिन पायलट, जो युवा मतदाताओं, गुर्जर समाज और पार्टी के एक बड़े वर्ग में लोकप्रिय हैं, उनकी राजनीतिक स्थिति को एकजुट कांग्रेस के रूप में पुनः स्थापित करना पार्टी के दीर्घकालिक हित में हो सकता है।

इस मुलाकात को इस रूप में भी देखा जा सकता है कि पायलट अब आक्रामक विपक्ष की भूमिका के बजाय संतुलित, परिपक्व और संगठित कांग्रेस का चेहरा बनने की ओर अग्रसर हैं।

राजनीति में प्रतीकों की शक्ति

राजनीति में मुलाकातें सिर्फ समय बिताने या चाय पीने के लिए नहीं होतीं — वे संकेत देती हैं, मानसिकता दर्शाती हैं, और दिशा तय करती हैं।

सचिन पायलट की यह पहल एक सकारात्मक राजनीतिक संकेत हो सकता है, बशर्ते इसे गहलोत खेमे द्वारा भी खुले मन से स्वीकार किया जाए।

पार्टी के लिए यह समय अवसर का है — यदि कांग्रेस इस संभावित संवाद को सही ढंग से दिशा देती है, तो वह 2028 में राजस्थान में पुनरागमन की नींव आज से रख सकती है।

वरना, यह मुलाकात भी इतिहास के उन क्षणों में गुम हो जाएगी, जो बहुत कुछ कह सकती थीं लेकिन कह नहीं पाईं।

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