लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
50 गांवों की श्रद्धा एक सूत्र में बंधी, “जय श्री श्याम” के जयकारों से गूंजा कस्बा
पादूकलां (नागौर)।
फाल्गुनी लक्खी मेले के दूसरे दिन एकादशी पर पद्मावती नगर के नाम से विख्यात पादूकलां आस्था के विराट महाकुंभ में तब्दील हो गया। पुलिस थाना क्षेत्र के करीब 50 गांवों से उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ ने कस्बे की हर गली और चौक को “जय श्री श्याम” के जयघोष से गुंजायमान कर दिया। खाटू श्याम के दरबार में भक्ति, उल्लास और जनसैलाब का अद्भुत संगम देखने को मिला।
521 फीट लंबा निशान बना आकर्षण का केंद्र
मेले का सबसे बड़ा आकर्षण रियांबड़ी से पहुंचा 521 फीट लंबा विशाल निशान रहा। सैकड़ों श्याम भक्तों ने इसे कंधों पर उठाकर पदयात्रा के रूप में पादूकलां तक पहुंचाया। मंदिर कमेटी ने प्रवेश द्वार पर पुष्पवर्षा, इत्र सेवा और माल्यार्पण के साथ भव्य स्वागत किया। ढोल-नगाड़ों और भक्तिमय धुनों के बीच “हारे का सहारा-श्याम हमारा” के उद्घोष से वातावरण भक्तिरस में डूबा।
डोडियाना, नथावड़ा, सेंसडा, पादूखुर्द, मेवड़ा, रियांबड़ी, खेडाधुणा, डांगावास, बिखरनियाकलां, पालड़ी कलां सहित आसपास के गांवों से दिनभर निशान यात्राएं पहुंचती रहीं। केसरिया साफों में सजे युवा, मंगलगीत गाती महिलाएं और उत्साही बच्चे—हर वर्ग की भागीदारी ने मेले को ऐतिहासिक स्वरूप दिया।
धार्मिक विरासत का केंद्र है पद्मावती नगर
पादूकलां संत परंपरा और आस्था की पावन भूमि के रूप में विख्यात है। यहां राजा भर्तृहरि के शिष्य की तपोभूमि खेचरनाथ स्थित है, जो साधना और त्याग का प्रतीक मानी जाती है। साथ ही गोगाजी महाराज का भव्य मंदिर और अन्य प्राचीन देवस्थान क्षेत्र की धार्मिक गरिमा को बढ़ाते हैं। गोगानवमी सहित विभिन्न अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
भक्ति, भव्यता और सामाजिक एकता का संगम
मंदिर परिसर को आकर्षक रोशनी और फूलों से सजाया गया। बाबा का अलौकिक श्रृंगार श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा। प्रसाद वितरण स्थल पर लंबी कतारें लगी रहीं, वहीं मेले में सजी दुकानों पर देर रात तक रौनक बनी रही। खिलौनों, श्रृंगार सामग्री और प्रसाद की दुकानों पर लोगों की भीड़ उमड़ती रही।
मेले के अंतिम दिन द्वादशी, 28 फरवरी को प्रातः 11 बजे बाबा को छप्पन भोग अर्पित किया जाएगा। विशेष पूजा-अर्चना और महाप्रसाद वितरण के साथ तीन दिवसीय महोत्सव का समापन होगा।
पद्मावती नगर पादूकलां का यह लक्खी मेला अब केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि 50 गांवों की आस्था, संत परंपरा की विरासत और सामाजिक एकता का विराट प्रतीक बन चुका है, जहां हर दिशा में भक्ति की गूंज और जनसैलाब इतिहास रचता नजर आता है।



















































