लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
संस्कारविहीन जीवन पर कटाक्ष है नाटक जंबूरा
जयपुर। नेट थिएट कार्यक्रमों की श्रंखला में आज प्रोग्रेसिव फॉर्म की ओर से डॉ संजीव चौधरी द्वारा लिखित और डॉ. गिरीश कुमार यादव द्वारा निर्देशित नाटक जंबूरा का सशक्त मंचन किया गया ।
नेट थिएट के राजेंद्र शर्मा राजू ने बताया कि नाटक में राशिक परिहार प्रवीण लश्कर विवेक जाखड़ स्थित पांडे मोहित सिंघल फैजान खान और राहुल कुमावत ने अपने सशक्त अभिनय से नाटक को जीवंत किया
सारांश
शून्य से सृष्टि की उत्पत्ति हुई थी। उस अनादि काल में न सत्य था न असत्य; न सत्ता की लालसा थी, न ही जाति-पाँति का कोई भेदभाव।
मनुष्य ने असभ्यता की गोद में जन्म लिया। भूख लगने पर वह पशुओं का शिकार करता था। परंतु समय के साथ उसकी आवश्यकताएँ रूप बदलने लगीं।
वह धीरे-धीरे सभ्यता और संस्कारों को अपनाने लगा तथा प्रगति के पथ पर अग्रसर हुआ। नैतिकता के क्षेत्र में विकास करते हुए उसने भौतिकता में भी अभूतपूर्व उन्नति की। विभिन्न धर्मों और समुदायों में वह शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व का जीवन जीने लगा। उस समय उसके जीवन के मूल मंत्र थे — “सम्मान” और “अहिंसा”।
किन्तु समय अपनी गति से चलता रहा।
मनुष्य की सोच की दिशा बदलने लगी।
धर्मों और समुदायों के भीतर जैसे-जैसे बदलाव आए, वैसे-वैसे उसके विचारों में विष घुलता गया।
स्वामित्व और सत्ता की होड़ में वह एक विषैला प्राणी बन गया — ऐसा प्राणी जो अब स्वयं अपनी ही जाति को डसने लगा है।
जो मनुष्य कभी अपनी भूख मिटाने के लिए पशुओं का शिकार करता था, आज वह सत्ता की भूख मिटाने के लिए मनुष्यों का ही शिकार कर रहा है।
तो क्या हम फिर उसी संस्कारविहीन आदिकाल की ओर लौट रहे हैं?
आइए — हम सब मिलकर इस पर गहराई से चिंतन करें, मनन करें — और फिर कुछ ठोस निर्णय लें।
भविष्य का निर्माण हमारे आज के विचारों और कर्मों पर निर्भर करता है।
नाटक में गरिमा सिंह राजावत वेशभूषा, मंच सज्जा विवेक जाखड़, फैजान खान, पर पार्श्व संगीत मोहित सिंघल, निशांत साहू और प्रकाश सजा सावन कुमार जांगिड़ की श्रेष्ठ रही ।
कार्यक्रम संयोजक नवल डांगी कैमरा और लाइट्स मनोज स्वामी की रही ।
