मिले सुर मेरा तुम्हारा ……………….
लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
आज से कई बरस पहले दूरदर्शन पर भारत की विविधता को दर्शाते हुए राष्ट्रीय एकता को परिभाषित करने के लिए एक गाना बहुत प्रचलित हुआ था “ मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा” आज 2025 में इस गाने को याद दिलाते हुए भारतीय डेलिगेशन ने इसे एक बार पुन: जीवित कर दिया है । हमारे नेशन का डेलिगेशन जिस तरह से बेबाक होकर पूरे विश्व को पाकिस्तान पर हुई कार्यवाही को बता रहा है ,उससे हमारा देश ही नहीं पूरा विश्व भी चकित है। पाकिस्तान के बेसुरों को समझ ही नहीं आ रही हैं। खासकर शशि थरूर और असदुद्दीन ओवैसी की शास्त्रीय वाकपटुता लोगों को अचंभित कर रही । आज असदुद्दीन ओवैसी एक देशभक्त के रूप में उभरकर देश के साथ-साथ भारत के मुस्लिमों का भी मान बढ़ा रहे हैं। हिन्दुस्तान जिदाबाद के नारे तो वो अपने लोगों से लगवा ही चुके हैं, बस अब भारत माता की जय भी बोल दें तो हिन्दू और मुस्लिम एकता की एक नयी मिसाल भी वो दर्शा सकते हैं। अगर ऐसा हो जाता है तो यक़ीनन बदलाव की नींव रखने वाले वो पहले मुस्लिम नेता भी हो सकते हैं ,अभी के लिए वो जो भी कर रहे हैं वो प्रशंसनीय है । इधर शशि थरूर का सरकार के प्रति सहयोग और पनामा में उनका ये कह देना कि अब गांधी का देश अपना दूसरा गाल आगे नहीं करेगा, अपितु प्रतिक्रिया देकर रहेगा। शशि थरूर का ये शाब्दिक तमाचा पाकिस्तान के साथ-साथ भारत के भी बहुत सारे लोगों को विचलित कर रहा है, जो भी हो पर उनका ये आक्रामक अंदाज़ आज के भारत का रुख बता रहा है और आतंकवाद के खिलाफ अपनी सोच का एक मजबूत पक्ष भी सबके सामने रख रहा है। 
इंडियन नेशन के इस डेलिगेशन ने ये जता दिया है कि विचारों में इतनी क्षमता होती है की वो किसी के भी वैचारिक स्तर को बदल सकते हैं जिसका ताज़ा उदाहरण यह है कि भारत के आम नागरिक जो कल तक कुछ विपक्षी नेताओं को उनकी नीतियों के कारण पसंद नहीं करते थे आज उन्हीं नेताओं के विचार जब भारतीय एकता के लिए एक हो गए तो वही आम आदमी अपने विचार बदलते हुए उन्हें अपने सर आँखों पर बिठा रहा है असदुद्दीन ओवैसी,शशि थरूर व अन्य विपक्षी नेताओं की लोकप्रियता तेज़ी से जिस तरह बढ़ी है ये उसका प्रमाण है|
अब समय आ गया है की वोट की राजनीति करने वालों को भी ये सोचना होगा की राष्ट्रीय एकता ही सर्वोपरि है अब एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी और बेमतलब का विरोध उन्हें जनता का मत नहीं दिला सकता, अगर वो अब भी सरकार की सही नीतियों में देशहित के साथ नहीं होंगें तो उनका पतन निश्चित है । यही कारण है की पिछले वर्षों में भारत के कई विपक्षी दलों के बड़े नेता अवरोध और अवधारणा में अंतर के चलते अपना दल छोड़कर, वर्तमान सरकार के दल में आ गए हैं और उनमें से कई नेता समाज के लिए अच्छा कार्य करते हुए अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इसलिए विपक्षी दलों की निरंतर हो रही हार और सरकार बनाने में असमर्थ होने का आंकलन करना होगा।
पिछले एक दशक से वर्तमान सरकार के प्रति देश की जनता का भरोसा क्यों जागृत हुआ अगर इस पर वार्ता की जाये तो अनेकों कारण सामने आ सकते हैं ,पर अगर विपक्षी दलों की हार का कारण जानने का प्रयास किया जाए तो बस एक ही कारण निकल कर सामने आता है की अधिकतर समय इन सभी विपक्षी दलों ने अपना ध्यान जनता और देश की प्रगति से हटा कर ,कभी जाति के नाम पर तो कभी एक विशेष धर्म के नाम पर अपने राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति करने की कोशिश की । दूसरी तरफ वर्तमान सरकार ने देश की पुरातन संस्कृति उसकी आध्यात्मिकता को जीवित करते हुए सर्व धर्म समभाव के साथ-साथ देश धर्म का भी निर्वाह किया बस यही अंतर है।
एक कहावत है की धारा के साथ-साथ बहने से डूबने से बचा जा सकता है पर उसके विपरीत चले जाने पर पानी के अन्दर ज्यादा देर टिका नहीं जा सकता भारत लोकतान्त्रिक मर्यादाओं के साथ चलता है और विपक्षी दल भी भारत के लोकतंत्र का हिस्सा हैं। बस इस हिस्से को भी अब भारत की लोकतांत्रिक मर्यादाओं के साथ चलना होगा उन्हें केवल अपने विचारों को बदलने की आवश्यकता है। वैसे तो ईश्वर के अलावा और कोई भी सम्पूर्ण नहीं होता है इसलिए मनुष्यों में सबके विचार सम्पूर्ण रूप से एक समान नहीं हो सकते पर हाँ कभी-कभी किसी का एक विचार कई अन्य विचारों को अपने साथ लिए ईश्वरीय शक्ति के नज़दीक जाने का मार्ग बन सकता है। भारत के प्रसिद्ध शहनाई वादक भारत रत्न से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खां जी ने पंडित ओंकारनाथ ठाकुर जी की पारंपरिक रचना के इस छंद का एक विचार जो उन्होंने 1993 में लन्दन में एक संगीत समारोह में सबके सामने साझा किया था, उसे याद रखना होगा,प्रथम सुर साधने का ब्रह्म ज्ञान और उसकी शिक्षा चाहे संगीत हो या व्यक्तिगत,सामाजिक, राजनैतिक,धार्मिक सभी के लिए अनिवार्य है, ये करना कठिन तो है पर असंभव भी नहीं।
प्रथम सुर साधे रटे नाम जो लो रहे,
यही घट में प्रगट प्राण नादे,
सप्त सुरन, तीन ग्राम, गुणीजन बखंत आवन गावं को ध्यान विद्या कतीन,
भेद पावे गुरण संग साधे|
अर्थात् ये कला कठिन है फिर भी गुरु के माध्यम से इसके रहस्यों को समझने की आशा की जा सकती है। अगर साधना करनी है तो प्रथम से साधना होगा मतलब पहला सुर सच्चा होना चाहिए ,जब तक वो नहीं सधेगा तब तक वो सुर आगे के सुरों की ओर बढ़ ही नहीं सकता है। आज जिस प्रकार भारतीय सरकार ने अपने डेलिगेशन में पक्ष और विपक्ष के नेताओं को देश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर देकर एक लय एक ताल में भारतीय विचार को सृजन करने का जो अधिकार दिया है । उसी को आगे बढ़ाते हुए सभी पार्टियों को देश के लोगों के प्रति समान भावना रखते हुए अब एक सुर में आना होगा तभी एक सम्पूर्ण सुर के साथ भारत की समृद्धि के गीत गाये जा सकेंगें । आशा है की शशि थरूर, असदुद्दीन ओवैसी व अन्य नेताओं के साथ-साथ विपक्षी दलों के सकारात्मक विचार भी यूँ ही कायम रहें, चाहे रचनात्मक मतभेद होता रहे, पर अवांछित मनभेद ना हो। एक बार संसद में अटल बिहारी बाजपेयी जी ने कहा था की सरकारें आयेंगी जायेंगी,पार्टिया बनेंगी बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिये उनके इस कथन के विचारों के साथ एकमत होने का समय आ गया है।
सबका एक मन हो जाना ही, भारत के मन की कामना है,
मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा,
सुर की नदियाँ हर दिशा से बहके, सागर में मिलें ,
बादलों का रूप लेके,बरसे हल्के-हल्के,
मिले सुर मेरा तुम्हारा ………
जयहिंद
कोमल अरन अटारिया
निर्देशक,लेखक,साहित्यकार