माउण्ट आबू के अचलगढ़ में होती देवाधिदेव महादेव के अंगूठें की पूजा

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

किशन वासवानी की रिपोर्ट

देश में काशी के बाद पुराणों में शिव का निवास माउण्ट आबू में,-अर्धकाशी का रूप माना जाता है।

माउण्ट आबू ।देवाधिदेव महादेव की लीला अपरम्पार है,जटाधारी शिव इस संसार की मोह माया से मुक्ति देकर अपने अपने भक्तो का बेड़ापार करते है। अन्य देवताओं से बनिस्पत् अपने भक्तों की सामान्य सी पूजा से प्रसन्न होने वाले देवाधिदेव को इसलिए महादेव भी कहा जता है।

अरावली पर्वत श्रृखला में शिव के निवास का वर्णन स्वयं शिव पुराण एवं स्कन्द पुराण में मिलता है। शिव पुराण एवं स्कन्द के अनुसार स्वयं शिव काशी के बाद विविध रूपों में माउण्ट आबू की अरावली पर्वत श्रृंखला में निवास करते है। इस लिए माउण्ट आबू को अर्धकाशी के नाम से भी जाना जाता है। महाशविरात्रि के अलावा श्रावण के पूरें माह में माउण्ट आबू में देश के सुदूरवर्ती भागों से देवाधिदेव महादेव के दर्शन के लिए आते है। पुराणों में उल्लेख है कि इन पर्वत श्रृंखला में स्वयं शिव, अन्नत: रूप में विद्यामान है। यहीं कारण भी है कि राजस्थान के सिरोही जिलें में सर्वाधिक मठ मंदिर पूरें जिलें में विभिन्न स्थानों पर बने हुए है।

अचल गढ़ – आखिर क्यों होती है, यहां पर देवाधिदेव महादेव के अंगूठें की पूजा..?

स्कन्द पुराण के अनुसार ऋषि वशिष्ठ इन्ही अरावली पर्वत माला में एक गुफा में तपस्या किया करते थे। उनके पास में एक गाय थी नन्दनी । स्कन्द पुराण में उल्लेख के अनुसार इन्द्र के बज्र के प्रहार से इस पर्वत श्रृंखला में एक ब्रहृम खाई बन गयी थी। और स्वयं ऋषि वशिष्ठ भी इसी ब्रहृम खाई के पास में ही बैठकर के तपस्या करते थे।

ब्रहृम खाई को भोलेनाथ ने अंगूठे से भरा था

इसी स्थान पर ब्रहृम खाई होने से ऋषि वशिष्ठ की गाय नन्दिनी उस ब्रहृम खाई में रोजाना गिर जाती थी। रोजाना की इसी समस्या से परेशान होकर के ऋषि वशिष्ठ ने इस ब्रहृम खाई को भरने की ठानी। और आग्रह पूर्वक पहुचें पर्वतों के राजा हिमालय राज के पास में। ऋषि वशिष्ठ के इस आग्रह को हिमालय राज ने जल्द ही स्वीकार कर अपने श्रेष्ठ पुत्र अरावली को इस ब्रहम् खाई को भरने के लिए भेजा। लेकिन खाई गहरी को नहीं भर पाया और फिर इसी स्थान पर पर्ण रूप से फैल कर लेट गया। इसी कारण अरावली पर्वत श्रृंखला विश्व में सर्वाधिक लम्बी पर्वत श्रृंखला मानी जाती है,जो राजस्थान के पूरें प्रदेश के अलावा पंजाब के बॉर्डर पर भी दिखाई देती है । जब हिमालय राज के श्रेष्ठ पुत्र अरावली इस ब्रह्म खाई को पाट पाने में सफल नहीं हो पाएं तो पुन: ऋषि की प्रार्थना पर हिमालय राज ने एक लंगड़ें पर्वत नंदीराज को एक विशाल अवरूद्ध सर्प पर सवार कर इस स्थान पर भेजा। यहां पर आने के बाद में नंदीश्वर पर्वत भी इस ब्रहृम खाई में भीतर गहराई तक समाने लगा,…..तो चिन्तित होकर ऋष्ठि वशिष्ठ ने देवाधिदेव महादेव से इस ब्रह्म खाई को भरने की प्रार्थना की। ऋषि वशिष्ठ की करूण प्रार्थना की पुकार सुन महादेव ने काशाी से ही अपने दाहिने पैर को फैलाकर के अपने अंगूठें से इस नंदीश्वर पर्वत को अधर कर  दिया। बाद में इस स्थान का नाम अचलेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हो गया।

अचलगढ़ बना अचलेश्वर महादेव

आज इस स्थान को अचलगढ़ के रूप में जाना जाता है। शिव पुराण एवं स्कन्द पुराण में यह उल्लेख है कि,स्वयं शिव के साक्षात् अंगूठें के इस स्थान पर होने से ही यह पर्वत स्वयं देवाधिदेव महादेव के अंगूठें पर स्थर अथवा अचाल है,इसलिए स्वयं एक साक्षात् रूप में स्वयं शिव इस स्थान पर विराजमान है। और मन से की प्रार्थना को वे जल्द पूरा करअप्ने भक्तो का कल्याण करते है।

शंकरमठ का निर्माण किया गया।

इसी प्रकार से माउण्ट आबू में काशी निवासी, श्री महेशानंद महाराज के द्वारा एक शंकरमठ का निर्माण किया गया। इस में 35 टन वजन के एक ही पथ्तर को तराश कर पांच फीट उंचा शिलिंग बनाया गया है। जिसमें महादेव के त्रिनेत व समुद्र की लहरों में महादेव के स्वरूप के दर्शन होते है। महाशिवरात्रि व श्रावण में भी यहां पर देवाधिदेव महादेव के दर्शनों के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है। और दिन एवं रात इस स्थान पर महादेव के अभिषेक के अलावा अनुष्ठान किए जाते है।

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