“महारानी गायत्री देवी जिन्होंने रखी महारानी कॅालेज की नींव
लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी
जब परदे से निकलीं संभावनाएँ
5 जुलाई 1944 — यह कोई सामान्य तारीख नहीं थी।
यह वह दिन था जब जयपुर की राजमाता गायत्री देवी ने भारत के शाही इतिहास में एक ऐसा अध्याय जोड़ा, जो परंपरा को छूते हुए भी प्रगति की ओर अग्रसर था।
इसी दिन की नींव थी — महारानी कॉलेज, जयपुर, एक ऐसा संस्थान जो नारी शिक्षा का ध्वजवाहक बना।
साहसिक शुरुआत: जब शिक्षा बनी आंदोलन
राजस्थान के सामाजिक ताने-बाने में जहाँ महिलाओं की शिक्षा पर सीमाएँ थीं, वहाँ 1944 में महिलाओं के लिए एक विशेष कॉलेज खोलना केवल एक शैक्षणिक निर्णय नहीं था, बल्कि एक सामाजिक क्रांति थी।
राजमाता गायत्री देवी ने 24 छात्राओं और एक अध्यापिका के साथ कॉलेज की शुरुआत की थी।
उनका उद्देश्य स्पष्ट था:
“नारी केवल सौंदर्य या परंपरा की मूर्ति नहीं, वह समाज की निर्माता है — और उसका निर्माण शिक्षा से होता है।”
गायत्री देवी: सौंदर्य, विद्या और विद्रोह की प्रतीक
गायत्री देवी स्वयं अनेक भाषाओं में पारंगत थीं, पेरिस से लेकर शांति निकेतन तक शिक्षा प्राप्त की थी, पोलो खेलती थीं, और Vogue मैगज़ीन की सबसे सुंदर महिलाओं में शामिल थीं।
परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण था उनका आत्मबल — जिसने उन्हें तीन बार सांसद, एक प्रभावशाली वक्ता और राजनीति में ईमानदारी का प्रतीक बनाया।
उनकी यही दृष्टि महारानी कॉलेज में भी झलकती है — जहाँ न केवल किताबें पढ़ाई जाती हैं, बल्कि स्वाभिमान, संवाद और स्वतंत्र सोच को भी पोषित किया जाता है।
महारानी कॉलेज: आज की प्रासंगिकता
आज जब देश महिला आरक्षण, लैंगिक समानता और नारी नेतृत्व की बात करता है,
तब महारानी कॉलेज एक जीवंत स्मारक बनकर सामने आता है —
जहाँ परंपरा और आधुनिकता का ऐसा संगम है जो सैकड़ों बेटियों को एक नई दिशा देता है।
यह कॉलेज सिर्फ डिग्री नहीं देता —
यह एक पहचान देता है, एक मंच देता है, और सबसे बढ़कर एक संदेश देता है:
“तुम अगर चाहे तो हर दिशा तुम्हारी हो सकती है।”
शिक्षित नारी, समृद्ध राष्ट्र
राजमाता गायत्री देवी ने जब जयपुर की धरती पर महिला शिक्षा का दीप जलाया था, तब शायद उन्हें भी यह आभास नहीं था कि उनकी यह लौ कभी नहीं बुझेगी।
5 जुलाई 1944 को जो बीज उन्होंने बोया, आज वह वटवृक्ष बन चुका है।
महारानी कॉलेज न केवल जयपुर, बल्कि पूरे भारत की नारी शिक्षा की प्रेरणा-स्थली है।
उनकी यह सोच कि “शिक्षा ही सच्चा श्रृंगार है” — आज और भी अधिक सार्थक लगती है।
“एक रानी ने जब किताबें हाथों में दीं, तो राजकुमारियाँ सदी की नेतृत्वकर्ता बन गईं।”










































