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मदद के अभाव में बिलखते बच्चे — सरकार ने रोकी अनुदान राशि, गैर-राजकीय बाल गृह संकट में”

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

लोक टुडे विशेष संवाददाता

राजस्थान में संचालित गैर-राजकीय फंडेड बाल देखरेख संस्थानों की सांसें अब केंद्र सरकार की मर्जी पर टिकी हैं। बाल अधिकारिता विभाग द्वारा 27 दिसंबर को जारी निर्देश के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 से ऐसे सभी बालगृहों को राज्य सरकार के पूर्ण नियंत्रण में लाने की तैयारी की जा रही है। लेकिन इस बदलाव की आड़ में, केंद्र सरकार ने अपने स्तर से दी जाने वाली वित्तीय सहायता को रोक दिया है — जिससे राज्यभर के बालगृहों में रहने वाले हजारों बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है।
कागज़ पर सुधार, ज़मीनी हकीकत में हाहाकार

राज्य सरकार का तर्क है कि जेजे एक्ट 2015 के तहत प्रत्येक बच्चे को परिवार आधारित देखभाल मिले — जैसे कि फोस्टर केयर, फिट पर्सन, या गृह वापसी। इसके पीछे “संस्थागत देखरेख कम करने और पुनर्वास बढ़ाने” की सोच है। परंतु जिन बच्चों के पास कोई माता-पिता या संरक्षक नहीं है — उनके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बताई गई है।
बिलखते बच्चे, खाली थालियां और बंद होती बाल शरणस्थली

अनेक गैर-सरकारी बालगृह संचालकों ने बताया कि “पिछले दो महीनों से हमें केंद्र सरकार से एक भी रुपया नहीं मिला। बिजली का बिल, राशन, स्टाफ की तनख्वाह — सब उधारी पर चल रहा है। कई बच्चों को छुट्टी पर घर भेज दिया गया है।”

एक संचालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया —

“इस नीति से सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें है जिनका कोई नहीं है। सरकार कहती है कि परिवार में भेजो, लेकिन जिनका परिवार नहीं है, वे कहाँ जाएँ?”

बाल संरक्षण या बजट प्रबंधन?

नरेंद्र कुमार वर्मा, सहायक निदेशक (बाल अधिकारिता), के हस्ताक्षरयुक्त पत्र में कहा गया है कि:बच्चों को प्राथमिकता से परिवार, दत्तक, फोस्टर या फिट पर्सन के पास भेजा जाए।

तीन महीने से अधिक अवधि से संस्थान में रहने वाले बच्चों का पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए।

अनाथ, बेसहारा बच्चों को केवल प्रमाण सहित ही संस्थान में प्रवेश दिया जाए।

लेकिन सवाल यह है कि —
क्या सभी जिलों में इतनी फोस्टर फैमिलियाँ हैं? क्या सभी अभिभावक तैयार हैं बच्चों को अपनाने को?
या फिर यह नीति सिर्फ आर्थिक बोझ कम करने की एक कोशिश है?

बचपन का सवाल है — नीति की नहीं, करुणा की ज़रूरत है

राजस्थान के अनेक जिलों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि छोटे-छोटे बच्चे अब भोजन, कपड़े, और देखरेख के लिए तरस रहे हैं।

केंद्र सरकार के बाल कल्याण बजट में हुई कटौती और राज्य सरकार के पास वैकल्पिक व्यवस्था न होने से स्थिति संवेदनशील से आपातकालीन बन चुकी है।

समाज क्या करे?

स्थानीय प्रशासन को जवाबदेह बनाया जाए — हर जिले की पुनर्वास प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
CSR आधारित सहयोग और धार्मिक संगठनों की भूमिका बढ़ाई जाए।
समाजसेवी संस्थाएं और मीडिया इस विषय को गंभीरता से उठाएँ।

एक सवाल सरकार से:

“बाल अधिकारों की बात करने वाले , क्या उन बच्चों के आँसू नहीं देख पा रहे  जिनके पास अब छत भी नहीं बची?”

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