लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
डुल्ला भट्टी की वीरता और सामाजिक न्याय की कहानी से जुड़ा पंजाब का लोकप्रिय पर्व
नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में मनाया जाने वाला लोहरी पर्व पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में विशेष रूप से लोकप्रिय है। यह त्योहार मुख्य रूप से फसलों की कटाई का जश्न और सर्दियों के अंत का स्वागत करने के लिए मनाया जाता है।
लोहरी मनाने के प्रमुख कारण
1. सर्दियों के अंत का स्वागत
लोहरी, मकर संक्रांति से एक दिन पहले आता है और इसे सर्दियों की ठंड समाप्त होने और सूरज की गर्मी बढ़ने का प्रतीक माना जाता है।
2. फसलों की कटाई का जश्न
किसान समुदाय गेंहू और रबी की फसल कटने के बाद खुशी मनाने के लिए एकत्रित होते हैं। लोग आग के चारों ओर बैठकर नाचते-गाते, और प्राकृतिक उपहारों के लिए आभार व्यक्त करते हैं।
3. धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
अग्नि को पवित्र माना जाता है। लोग उसमें गुड़, तिल और मूंगफली डालकर सूर्य देवता और प्रकृति को धन्यवाद देते हैं। यह त्योहार नई शुरुआत और समृद्धि का भी प्रतीक है।
4. परिवार और बच्चों का उत्सव
Lohri पर बच्चों और नवविवाहित जोड़ों को गिफ्ट, पैसे और मिठाइयाँ दी जाती हैं। लोग गीत गाकर और भांगड़ा/गिद्दा नृत्य करके सामूहिक उत्सव मनाते हैं।
लोहरी की कहानी: डुल्ला भट्टी की वीरता
लोहरी सिर्फ फसल का त्योहार नहीं है; यह साहस, दान और सामाजिक न्याय का प्रतीक भी है।
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डुल्ला भट्टी कौन थे?
16वीं सदी में पंजाब के किसान और जमींदार डुल्ला भट्टी ने मुगल शासन के दौरान गरीब और असहाय लोगों की मदद की। -
लड़कियों की रक्षा
उस समय अमीर और शासक गरीब लड़कियों के साथ अन्याय करते थे। डुल्ला भट्टी ने उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की और शादी के लिए जायदाद और दहेज प्रदान किया। -
त्योहार से जुड़ाव
लोग उनकी वीरता और दान की याद में Lohri मनाते हैं। लोकगीतों में उनका नाम बार-बार आता है, जैसे:
“Sundri, Mundri, Dulla Bhatti da kheda”।
यह गीत परिवार और बच्चों द्वारा आग के चारों ओर गाया जाता है। -
अग्नि के चारों ओर जश्न
लोग गुड़, तिल और मूंगफली डालकर लोकगीत गाते हैं। इसे “सर्दियों की ठंड से सुरक्षा, सूरज की गर्मी का स्वागत और सामाजिक न्याय का उत्सव” भी कहा जाता है।