क्या है प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ प्रकरण ? राजीव शर्मा की डीजीपी पद पर नियुक्ति

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

महेश झालानी वरिष्ठ पत्रकार

प्रदेश में मुख्य सचिव के बाद सबसे महत्वपूर्ण पद पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) का होता है । मुख्य सचिव की नियुक्ति के लिए राज्य सरकार को पूरी स्वतंत्रता होती है । जबकि डीजीपी नियुक्ति के लिए राज्यो की सरकार प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ के सम्बंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए निर्देशों से बंधी हुई है । हालांकि यूपी और महाराष्ट्र की सरकारों ने सर्वोच्च न्यायालय से बचने के लिए नया गलियारा खोज लिया है । लेकिन राजस्थान सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की गाइडलाइन की पालना करते हुए डीजी की नियुक्ति की जाती है ।

राजीव शर्मा की नियुक्ति में उल्लेख

राज्य के कार्मिक विभाग द्वारा राजीव शर्मा की नियुक्ति के सम्बंध में जो आदेश जारी किये गए है उसमें प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (सिविल रिट पिटीशन संख्या 310/1996) का उल्लेख किया गया है । राजस्थान में मुख्य सचिव नियुक्त करने के लिए वरिष्ठता को कई बार लांघा गया है । भैरोसिंह शेखावत ने मीठालाल मेहता को मुख्य सचिव नियुक्त करने के लिए कई अधिकारियों की वरिष्ठता को नजरअंदाज किया गया । इसी तरह अशोक गहलोत ने भी निरंजन आर्य को बहुत जूनियर होने के बाद भी मुख्य सचिव की कुर्सी पर बैठाया गया । वर्तमान मुख्य सचिव सुधांश पन्त भी जूनियर होने के बाद भी इस पद पर पदासीन है ।

क्या है पूरा मामला

आज मैं आपको बताना चाहता हूँ कि प्रकाश सिंह का असल मामला था क्या ? दरअसल
प्रकाश सिंह एक सेवानिवृत्त भारतीय पुलिस सेवा अधिकारीथे, जो पुलिस महानिदेशक (डीजीपी)
के सर्वोच्च पद तक पहुंचे । उन्होंने सीमा सुरक्षा बल, उत्तर प्रदेश पुलिस और असम पुलिस के प्रमुख के रूप में कार्य किया । भारत में पुलिस सुधारों के प्रमुख वास्तुकार के रूप में उनकी भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पुलिस अफसरों में से एक माना जाता है।

1966 में सेवानिवृत्ति के बाद कोर्ट में अर्जी लगाई 2006 में फैसला आया

आईपीएस से सेवानिवृत्त (1966) होने के बाद, उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की । जनहित याचिका का ऐतिहासिक फैसला 2006 में आया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को पुलिस में संरचनात्मक परिवर्तन करने के लिए विशिष्ट निर्देश दिए हैं ताकि इसे बाहरी दबावों से बचाया जा सके । इसके अतिरिक्त इसे लोगों के प्रति जवाबदेह बनाया जा सके। फैसले में मुख्य निर्देश डीजीपी (पुलिस महानिदेशक) का कार्यकाल और चयन तय करना था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि ऐसी स्थिति न आए कि कुछ महीनों में रिटायर होने वाले अधिकारियों को यह पद दे दिया जाए। राजनीतिक हस्तक्षेप न हो, इसके लिए पुलिस महानिरीक्षक के लिए न्यूनतम कार्यकाल की मांग की गई।

योगी सरकार जिस सुप्रीम कोर्ट के फैसले की दवाई दे रही है वह 2006 में आ गया था

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार आज जिस सुप्रीम कोर्ट के फैसले की दुहाई दे रही है. उसे सर आंखों पर बता रही है, वह 22 सिंतबर, 2006 में ही आया था. उसे प्रकाश सिंह फैसले के तौर पर जाना जाता है । इस मसले पर सितंबर 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया । अदालत ने सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की सरकारों से पुलिस महकमे में सुधार लाने की बात की । कुछ ऐसे दिशानिर्देश दिए जिससे पुलिस बिना किसी राजनीतिक दबाव के काम कर सके ।

अहम दिशानिर्देशों में सबसे अहम डीजीपी के चयन, नियुक्ति और उनके कार्यकाल से जुड़ा था । अदालत ने साफ किया था कि रिटायरमेंट के मुहाने पर खड़े अफसरों के बजाय ऐसे अधिकारी को डीजीपी बनाया जाए जिनका 2 बरस का कार्यकाल हो, ताकि कोई राजनेता जब चाहे तब उनका तबादला न कर सके और पुलिस विभाग में एक स्थिरता आए ।

लेकिन क्या ये हुआ? कई ऐसे राज्य है जहां सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अनदेखी की गई । इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी लंबित है । ये मामला आधे दर्जन से भी ज्यादा राज्यों में अस्थाई डीजीपी की नियुक्ति का है । दिलचस्प ये है कि उत्तर प्रदेश की सरकार खुद इस मसले पर निशाने में है। याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, झारखंड, तेलंगाना, पंजाब, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्य अस्थाई डीजीपी नियुक्त करने की रिवाज कायम कर रहे हैं ।

दरअसल, उत्तर प्रदेश में पिछले करीब दो बरस में चार अस्थाई डीजीपी बनाए जा चुके हैं । पहले, देवेन्द्र सिंह चौहान को मई 2022 से मार्च 2023 तक डीजीपी बनाया गया । फिर राजकुमरा विश्वकर्मा महज दो महीने के लिए अप्रैल-मई 2023 में यूपी के डीजीपी रहे । उनके बाद आईपीएस अधिकारी विजय कुमार आए. कुमार जून 2023 से जनवरी 2024 तक डीजीपी रहे. उनके बाद फरवरी 2024 से प्रशांत कुमार डीजीपी रहे ।

तब 13 अधिकारियों की वरिष्ठता को अनदेखी कर विजय कृष्ण को डीजीपी नियुक्त किया गया है । प्रशांत कुमार को लेकर विवाद एक और भी था, जब उनकी नियुक्ति हुई, वे वरिष्ठ अधिकारियों की सूची में 19वें नंबर पर होने के बावजूद राज्य के डीजीपी बना दिए गए । यह नियुक्ति स्पस्ट रूप से सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की स्पस्ट अवहेलना है । लेकिन योगी के लिए न तो न्यायालय के निर्देशों की परवाह है और न ही वे केंद्र सरकार के नियमों को मानते है ।

सवाल है कि योगी सरकार की नई कमेटी वाकई 2006 वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले की दिशा में बढ़ाया गया कदम है या फिर ये भी राजनीतिक कलाबाजी का एक नया नमूना है? देखना ये है कि डीजीपी के पद पर अब तक अस्थाई नियुक्तियों की वजह से होने वाला विवाद नई व्यवस्था से थमता है या और बढ़ता है ? योगी सरकार ने न्यायालय के निर्देशों को धता बताते हुए एक कमेटी का गठन कर अपने चहेते अफसर को डीजीपी पद पर बैठाया है । सौभाग्य से राजस्थान की सरकार न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना से बची हुई है ।

राजस्थान सरकार ने न्यायालय की गाइडलाइन की अनुपालना में उन 9 आईपीएस अधिकारियों का पैनल संघ लोक सेवा आयोग को भेजा था । ये वे अधिकारी थे जिन्होंने 30 वर्षो की सेवा पूरी करली थी तथा जिनकी सेवा 2 वर्ष से कम नही थी । यूपीएससी ने वरिष्ठता और योग्यता के आधार पर राजीव शर्मा, राजेश निर्वाण और संजय अग्रवाल के नाम शॉर्टलिस्ट कर राज्य सरकार को भेजे । मुख्यमंत्री भजनलाल ने वरिष्ठता और योग्यता का सम्मान करते हुए राजीव शर्मा को डीजीपी नियुक्त किया है ।

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