लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
21वीं सदी की तीसरी दशक में प्रवेश कर चुकी जनरेशन Z (GenZ), यानी वे युवा जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए, आज भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श के नए निर्णायक बनते जा रहे हैं। सवाल यह है—क्या टीवी चैनल, अख़बार, या परंपरागत मीडिया इन पर कोई प्रभाव छोड़ पा रहे हैं? यदि नहीं, तो GenZ किन स्रोतों को ‘विश्वसनीय’ मानती है? यह विश्लेषण इस जनरेशन की मनोवृत्ति, सूचना व्यवहार और डिजिटल प्राथमिकताओं को समझने का प्रयास है।
टीवी और अख़बार: अब सूचना नहीं, पृष्ठभूमि की गूंज
GenZ के लिए समाचार पत्र और टीवी चैनल अब ‘मुख्य सूचना स्रोत’ नहीं रहे। इसके पीछे कई कारण हैं:
धीमी गति: अख़बार में खबरें एक दिन बाद मिलती हैं, जबकि GenZ को सब कुछ रीयल-टाइम चाहिए—अब और इसी वक्त।
राजनीतिक पक्षधरता: टीवी चैनलों की चीख-चीखकर की गई बहसें GenZ को “pre-decided narrative” लगती हैं। उन्हें लगता है कि एंकर अब रिपोर्टर नहीं, प्रवक्ता बन चुके हैं।
संवाद का अभाव: परंपरागत मीडिया एक तरफा होता है, जबकि GenZ इंटरैक्टिव और पार्टिसिपेटरी मीडिया की ओर आकर्षित है।
Visual fatigue: टीवी की विजुअल भाषा अब पुरानी लगने लगी है। GenZ vertical reels, aesthetic design, concise info की शौकीन है।
तो GenZ की मीडिया ब्रह्मांड क्या है?
विश्वसनीय माने जाने वाले स्रोत:
Instagram & YouTube Creators: ‘Dhruv Rathee’, ‘The Deshbhakt’, ‘Abhi and Niyu’, ‘Ranveer Allahbadia (BeerBiceps)’, ‘Think School’ जैसे चैनल GenZ को तथ्यात्मक, आकर्षक और वैकल्पिक जानकारी प्रदान करते हैं।
Reddit, Twitter (X): ट्रेंड्स, मीम्स और माइक्रो डिबेट के लिए ये प्लेटफॉर्म लोकप्रिय हैं। यहां वे “echo chamber” से बाहर की बातें जानने की कोशिश करते हैं।
Podcasts & Longform videos: YouTube पर 30-60 मिनट के thoughtful videos या Spotify पर आधारित पॉडकास्ट GenZ को in-depth context देने में प्रभावी हैं।
WhatsApp/Telegram communities: यह नया भरोसे का तंत्र है—जहां GenZ अपने ही चुने हुए ‘trusted micro-ecosystem’ से सूचनाएं प्राप्त करती है।
GenZ की खबरों को समझने की दृष्टि:
संदेह के साथ उत्सुकता: GenZ किसी भी खबर को पहली बार मानने से पहले जांचने की प्रवृत्ति रखती है।
विडंबना और व्यंग्य: GenZ के लिए ‘मेम’ एक सूचना उपकरण है। उनका व्यंग्य ही उनकी चेतना है।
विषय आधारित लगाव: GenZ राजनीति की नहीं, climate change, gender rights, entrepreneurship, mental health, crypto, AI जैसे विषयों की परवाह करती है।
स्वतंत्रता की भावना: उन्हें ऐसा कुछ चाहिए जो न सरकारी हो, न कॉर्पोरेट—free-thinking media।
पारंपरिक मीडिया के लिए चुनौती
यदि टीवी और अख़बार GenZ को जोड़ना चाहते हैं, तो उन्हें platform नहीं, mindset बदलना होगा।
उन्हें संवादी, fact-driven, meme-savvy, multilingual और emotionally intelligent बनना होगा।
Reels, explainers, quick bullet videos, youth-led interviews ही अब GenZ तक पहुँचने का सेतु हैं।
GenZ अब ‘सूचना की खपत करने वाली पीढ़ी’ नहीं है, बल्कि वह स्वयं ‘सूचना निर्माता’ बन गई है। वह ‘Anchor-based opinion’ नहीं, बल्कि ‘peer-based trust’ पर चलती है। उसकी दुनिया अब स्क्रीन तक सीमित नहीं, बल्कि Swipe culture से Sense-making culture की ओर बढ़ रही है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि टीवी और अख़बार GenZ तक पहुँच रहे हैं या नहीं—बल्कि यह है कि क्या वो अपनी विश्वसनीयता की परिभाषा बदलने को तैयार हैं?
– आश्चर्य तिवारी
(Youth Media Analyst & Digital Culture Commentator)










































