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कानून की असली ताक़त उसकी निष्पक्षता में है, न कि राजनीतिक इस्तेमाल में

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

केवल समय ही तय भारतीय लोकतंत्र का भविष्य
हेमराज तिवारी
भारतीय लोकतंत्र की विडम्बना यही है कि यहाँ कानून भी अक्सर राजनीति का औजार बन जाते हैं। सत्ता में बैठे दल जब नए विधेयक प्रस्तुत करते हैं, तो वे केवल जनहित का परिधान ओढ़े रहते हैं, जबकि भीतर राजनीति की गहरी चालें बुन रही होती हैं। भाजपा सरकार द्वारा संसद में लाए गए तीन विधेयक—संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक, 2025, पंच राज्य क्षेत्र शासन (संशोधन) विधेयक, 2025 और अपराध प्रक्रिया (संशोधन) विधेयक, 2025—इसी श्रेणी के प्रतीक हैं। पहली नज़र में ये कानून राजनीति के अपराधीकरण पर अंकुश लगाने का गंभीर प्रयास प्रतीत होते हैं, परंतु यदि इन्हें गहराई से देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल नैतिकता का उद्घोष नहीं, बल्कि सत्ता की शतरंज पर चली गई चतुर चालें भी हैं।

इन विधेयकों में यह प्रावधान किया गया है कि यदि कोई मुख्यमंत्री, मंत्री अथवा विधायक किसी आपराधिक मामले में दोषसिद्ध पाया जाता है, तो उसे तुरंत पदच्युत होना पड़ेगा। इतना ही नहीं, यदि वह तीस दिन के भीतर जमानत प्राप्त न कर सके, तो उसकी विधायी स्थिति भी संकट में पड़ जाएगी। सुनने में यह प्रावधान आदर्श लगता है, मानो राजनीति से अपराध को समाप्त करने का जादुई मंत्र मिल गया हो। किंतु प्रश्न यह है कि क्या भारतीय राजनीति का इतिहास इतना भोला है कि केवल एक संशोधन से राजनीति का अपराधीकरण ध्वस्त हो जाएगा?

वास्तव में यह कदम भाजपा के लिए दोहरे लाभ वाला है। एक ओर वह जनता के बीच यह संदेश प्रसारित कर सकती है कि उसकी सरकार पारदर्शिता और ईमानदारी के नए मानक गढ़ रही है। दूसरी ओर, यह प्रावधान विपक्षी दलों के नेताओं पर तलवार की तरह लटक सकता है, क्योंकि भारतीय राजनीति में मुकदमेबाजी से बचा कौन है? विपक्षी दलों के कई शीर्ष नेता पहले से ही मुकदमों में घिरे हुए हैं। ऐसे में यदि उनके विरुद्ध दोषसिद्धि होती है, तो भाजपा न केवल उनकी छवि धूमिल कर सकती है, बल्कि सत्ता की राह में उनके प्रभाव को भी कमजोर कर सकती है।

यहाँ प्रश्न केवल कानून का नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे राजनीतिक उद्देश्य का है। यदि वास्तव में राजनीति को अपराधमुक्त करना ही लक्ष्य होता, तो क्या भाजपा यह सुनिश्चित नहीं करती कि ऐसे प्रावधान अतीत से ही समान रूप से सभी दलों के नेताओं पर लागू हों? क्या यह सुनिश्चित नहीं किया जाता कि जाँच एजेंसियाँ सत्ता के दबाव से मुक्त होकर निष्पक्षता से काम करें? जब तक जाँच एजेंसियाँ स्वतंत्र नहीं होंगी, तब तक ऐसे कानून सत्तारूढ़ दल के लिए विपक्ष को घेरने का हथियार ही बने रहेंगे।

विपक्ष का यह तर्क निराधार नहीं कि सरकार ने इन विधेयकों को जिस शीघ्रता और आक्रामकता से पेश किया है, उसके पीछे राजनीतिक लाभ का बड़ा गणित छिपा है। लोकसभा अध्यक्ष की सहमति से जब गृहमंत्री अमित शाह ने ये विधेयक पेश किए, तो वह केवल तकनीकी कदम नहीं था; वह एक संदेश था—कि भाजपा अब केवल चुनावी मैदान में नहीं, बल्कि कानूनी अखाड़े में भी विपक्ष को पछाड़ने को तैयार है।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि इन प्रावधानों का सबसे बड़ा असर राज्यों की राजनीति पर पड़ेगा। कई राज्यों में विपक्षी दल सत्ता में हैं, और वहाँ के मुख्यमंत्री या मंत्री यदि मुकदमों में उलझे पाए जाते हैं, तो भाजपा को नैतिक ऊँचाई मिल जाएगी। वह जनता के बीच यह प्रचार कर पाएगी कि उसकी सरकार ईमानदार है और विपक्ष भ्रष्ट। यही असली ‘राजनीतिक मर्म’ है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय लोकतंत्र में कानून अक्सर “चयनात्मक” ढंग से लागू होते हैं। जो सत्ता में होता है, वह अपने समर्थकों के विरुद्ध कानून का इस्तेमाल कम करता है, और विरोधियों पर अधिक। इतिहास साक्षी है कि चाहे कांग्रेस रही हो या भाजपा, दोनों ने जाँच एजेंसियों और कानूनी प्रावधानों का प्रयोग प्रायः राजनीतिक हथियार के रूप में किया है। ऐसे में यह मान लेना कि नए विधेयक राजनीति से अपराध का अंत कर देंगे, केवल एक आदर्शवादी कल्पना है।

कानून का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा जब वह निष्पक्षता से लागू किया जाए। किंतु यह कैसा संयोग है कि चुनावों के ठीक पूर्व ऐसे विधेयक लाए जाते हैं, जब सत्ता को अपने पक्ष में माहौल बनाने की आवश्यकता होती है? क्या यह कदम वास्तव में जनता की भलाई के लिए है, या केवल जनमत को प्रभावित करने की चाल?

सच तो यह है कि इन विधेयकों ने राजनीति में एक नया विमर्श अवश्य खड़ा कर दिया है। सत्ता पक्ष कह सकता है कि उसने भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई शुरू कर दी है, जबकि विपक्ष इसे लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार बता सकता है। दोनों दृष्टियाँ अपने-अपने हित साधन से प्रेरित हैं।

शूचिता और जवाबदेही की उम्मीद की जा सकती है

फिर भी, जनता के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यदि ये प्रावधान निष्पक्षता से लागू होते हैं, तो निश्चित रूप से यह राजनीति में शुचिता और जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। किंतु यदि यह केवल विरोधियों को निशाना बनाने का साधन बन गया, तो यह लोकतंत्र को और अधिक खोखला कर देगा।

भारतीय राजनीति का यही द्वंद्व है—यहाँ हर सुधार अपने साथ संदेह का बीज भी बोता है। तीन नए विधेयक एक ओर आशा जगाते हैं कि राजनीति से अपराध का बोझ घटेगा, वहीं दूसरी ओर यह आशंका भी पैदा करते हैं कि यह सत्ता-संतुलन बदलने का एक और हथियार है।

कानून का मूल्य उसके कागज़ी प्रावधानों में नही?

समापन में यही कहा जा सकता है कि कानून का मूल्य उसके कागज़ी प्रावधानों में नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की निष्पक्षता में है। यदि इन विधेयकों को सचमुच न्याय और नैतिकता की कसौटी पर लागू किया गया, तो यह लोकतंत्र को नई ऊँचाई पर ले जाएंगे। किंतु यदि इनका प्रयोग विपक्ष को चुप कराने के लिए किया गया, तो इतिहास इन्हें केवल “सत्तालोलुप राजनीति” की एक और चाल के रूप में ही याद करेगा।

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