“कनाडा में कपिल शर्मा के कैफ़े पर गोलीबारी:- आतंक की परछाई”

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हेमराज तिवारी | संपादकीय विशेष, लोक टुडे

मंच पर हँसी बाँटने वाला अब बना आतंक की ख़बर का हिस्सा

कपिल शर्मा — एक ऐसा नाम जिसने पिछले एक दशक में भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में फैले प्रवासी भारतीयों के बीच हँसी और मनोरंजन का पर्याय बना लिया।
पर अब जब कपिल शर्मा के नाम से जुड़ा “कैफ़े कॉफ़ी विद कपिल” कनाडा में आतंकी गोलीबारी का शिकार बना है, तब सवाल केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि प्रवासी भारतीयों की अस्मिता, आत्मविश्वास और जीवन की सामान्यता पर भी उठता है।
कॉफी की मेज़, हँसी की महफ़िल — अब गोलियों की आवाज़ में दब गई

कैफ़े का मक़सद सीधा था —
“कॉफी के ज़रिए खुशियाँ बाँटना।”
परंतु अब वही कैफ़े आतंक की शिकार बन चुका है।
कपिल शर्मा की टीम का यह बयान कि —”हम इस सदमे से उबर रहे हैं… लेकिन हार नहीं मानेंगे” — केवल भावुक प्रतिक्रिया नहीं है, यह भारतीय जिजीविषा का प्रतिनिधि स्वर है। खालिस्तानी आतंक: लोकतांत्रिक मुल्यों पर हमला

खबरों के अनुसार, इस हमले की जिम्मेदारी एक खालिस्तानी आतंकी संगठन ने ली है।
यह न केवल भारतीय हस्तियों को धमकाने की कोशिश है, बल्कि लोकतंत्र, बहुसंस्कृतिवाद और वैश्विक सहिष्णुता के उस तानेबाने पर सीधा प्रहार है, जिसे कनाडा जैसे देश अपनी पहचान मानते हैं।

आज सवाल सिर्फ कपिल शर्मा के कैफे पर हमला नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या कनाडा की भूमि अब राजनीतिक प्रचार और उग्रपंथ का मंच बनती जा रही है

कला पर आक्रमण, समाज पर चोट

एक कॉमेडियन, एक कैफ़े, एक कप कॉफ़ी — इन सबका उद्देश्य समाज को जोड़ना था, मुस्कराहट फैलाना था।
लेकिन जब आतंक हँसी के घर में घुस आता है, तो वह केवल दीवारें नहीं तोड़ता, वह सांस्कृतिक पुलों को ध्वस्त करता है।

यह हमला केवल कपिल शर्मा पर नहीं — यह हमला है भारतीय सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर पर, जो सीमाओं से परे जाकर दिल जीतता रहा है।

क्या करे कनाडा? क्या बोले भारत?

कनाडा की सरकार के लिए यह केवल एक लॉ एंड ऑर्डर इश्यू नहीं है — यह उसकी राजनीतिक नैतिकता की कसौटी है।
यदि खालिस्तानी तत्व खुलेआम आतंक फैला रहे हैं और भारतीय संस्थाओं को निशाना बना रहे हैं, तो इसकी जिम्मेदारी केवल सुरक्षा एजेंसियों की नहीं, बल्कि कनाडा की राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी बनती है।

भारत सरकार को भी चाहिए कि वह इस हमले को केवल एक प्रवासी मामले की तरह न देखे, बल्कि इसे भारतीय सॉफ्ट पावर और सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व पर हमला मानकर, राजनयिक और वैश्विक मंचों पर आवाज़ उठाए।

एक कप कॉफ़ी से जो उम्मीद थी, उसे ज़िंदा रखना ज़रूरी है

कपिल शर्मा का कैफ़े एक प्रतीक है — उस भारतीय आत्मा का, जो दुनिया के किसी कोने में क्यों न हो, मुस्कुराहट के साथ जीना जानती है।
हमले से भय हो सकता है, लेकिन उससे हँसी, प्रेम और लोकतंत्र का स्वर दब नहीं सकता।
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आतंक, आस्था और अभिव्यक्ति के बीच दीवारें खड़ी न कर सके।
और यह भी कि —
कॉफ़ी की भाप से उठती गर्मी, बंदूक की बारूद से ज़्यादा ताकतवर हो।

यदि एक कैफ़े को निशाना बनाया गया है, तो यह समय है पूरी सभ्यता को साथ खड़े होने का।

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