लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का हालिया बयान — “मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को हटाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है, इनको पता ही नहीं है, जन भावनाओं को समझना होगा” — न केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया है, बल्कि यह प्रदेश की मौजूदा सत्ता और विपक्ष के बीच चल रही अंदरूनी खींचतान को भी उजागर करता है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब राजस्थान की राजनीति में अस्थिरता और अंदरूनी असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। सवाल यह है कि क्या वास्तव में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को हटाने की कोई रणनीति चल रही है? या यह बयान सिर्फ जनमानस में भ्रम फैलाने का एक प्रयास है?
जनता की भावना या राजनीतिक हथियार?
राजनीति में जन भावना का ज़िक्र अक्सर तब किया जाता है जब सत्ता पक्ष या विपक्ष अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है। लेकिन “जन भावना” वास्तव में क्या है, और …
[9:37 am, 26/06/2025] Raavan Haridas: “क्यों नहीं मांगी कांग्रेस ने माफ़ी?”
“आपातकाल कोई भूल नहीं — वह लोकतंत्र पर हमला था।”
25 जून 1975 — एक ऐसा दिन जिसे भारतीय लोकतंत्र कभी भुला नहीं सकता। इस रात, संविधान को स्थगित किया गया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दिया गया, और भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से एक व्यक्तिगत सत्ता की प्रयोगशाला में बदल दिया गया। यह तानाशाही प्रयोग था — और इसके पीछे थीं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी।
आज, जब देश लोकतंत्र की रक्षा के लिए हर कोने में सजग दिखता है, तब सवाल यही है — क्या कांग्रेस पार्टी ने आज तक आपातकाल के लिए माफ़ी मांगी?
उत्तर स्पष्ट है — नहीं।
माफ़ी न मांगना एक विचारधारा का प्रतिबिंब है
माफ़ी सिर्फ शब्द नहीं होती — वह आत्ममंथन और सुधार की पहली सीढ़ी होती है। 2025 में जब आपातकाल को 50 साल होने जा रहे हैं, तब भी कांग्रेस पार्टी आपातकाल को “उस समय की ज़रूरत” बताकर टालती रही है। इससे स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के डीएनए में आज भी सत्ता सर्वोपरि है, लोकतंत्र नहीं।
यह वही पार्टी है जिसने इमरजेंसी के बाद भी अपने चरित्र में कोई मूलभूत बदलाव नहीं किया। मीडिया को नियंत्रित करना, संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करना, और न्यायपालिका में हस्तक्षेप — ये सभी लक्षण आज भी कांग्रेस की मानसिकता में दिखते हैं।
इतिहास भूलता नहीं — जनता भी नहीं
यह बात सही है कि आपातकाल के बाद 1977 में जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था, लेकिन सत्ता के भूखे नेताओं ने धीरे-धीरे फिर अपनी पकड़ बना ली। जो लोग तब चुप थे, आज भी चुप हैं। और यही चुप्पी सबसे बड़ा अपराध है।
क्या कोई भी राष्ट्र, जिसकी आत्मा लोकतंत्र है, एक ऐसी पार्टी को नेतृत्व सौंप सकता है जिसने स्वयं लोकतंत्र को बंदी बनाया हो?
लोकतंत्र सिर्फ चुनाव जीतना नहीं होता
लोकतंत्र संस्थाओं का सम्मान है, आलोचना का सम्मान है, और सबसे बढ़कर जनता का सम्मान है। यदि कांग्रेस आज भी यह मानती है कि आपातकाल एक “राजनीतिक निर्णय” था, तो उसे स्वयं को लोकतांत्रिक दल कहना बंद कर देना चाहिए।
जिस दिन कांग्रेस आपातकाल को खुले मंच से निंदा करते हुए, देश से माफ़ी मांगेगी — वह दिन भारतीय राजनीति में सच्चे आत्मचिंतन का आरंभ होगा।
यदि आज फिर कोई इंदिरा गांधी सत्ता में होती — क्या आपातकाल दोहराया नहीं जाता?
इस सवाल का जवाब देश के युवा, बुद्धिजीवी, और लोकतंत्र प्रेमी जनता को स्वयं तय करना है।
“माफ़ करना एक महान गुण है — लेकिन पहले स्वीकार तो कीजिए कि आप दोषी थे।”










































