लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
कभी गंगधार में पेड़ों पर पड़ते थे झूले, गूंजते थे सावन के गीत और घर-घर बनते थे मालपुए; बदलते दौर में सिमटती गई लोक परंपराएं
गंगधार, झालावाड़ | लोक टुडे से सुनील निगम
सावन की रिमझिम फुहार, चारों ओर फैली हरियाली, मिट्टी की सोंधी खुशबू और पेड़ों की डालियों पर पड़े झूले… हरियाली अमावस्या का नाम आते ही गंगधार अंचल के बुजुर्गों की आंखों के सामने सावन की वो तस्वीरें ताजा हो जाती हैं, जब यह पर्व सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं था, बल्कि लोक संस्कृति, मेल-मिलाप और सामूहिक खुशियों का उत्सव हुआ करता था।
पेड़ों की डालियों पर पड़ते थे झूले
एक दौर था जब हरियाली अमावस्या से कई दिन पहले ही गांवों में नीम, आम, बरगद और अन्य बड़े पेड़ों की मजबूत डालियों पर रस्सियों के झूले डाल दिए जाते थे। सावन की फुहारों के बीच महिलाएं और युवतियां समूह में झूला झूलतीं और पारंपरिक सावन गीत गाती थीं।
झूलों के आसपास बच्चों की चहल-पहल, महिलाओं की हंसी-ठिठोली और लोकगीतों की गूंज से गांव-कस्बों का माहौल पूरी तरह सावन के रंग में रंग जाता था।
आज वही पेड़ हैं, वही सावन है, लेकिन पेड़ों पर झूलों की वह रौनक कहीं नजर नहीं आती।
घर-घर बनते थे मालपुए, गलियों में घुलती थी खुशबू
हरियाली अमावस्या के दिन घरों में भी खास रौनक रहती थी। महिलाएं सुबह से ही पारंपरिक पकवान बनाने में जुट जाती थीं। घी में छनते गर्मागर्म मालपुओं की खुशबू घर से निकलकर पड़ोस तक पहुंचती थी। मालपुओं के साथ पकौड़ी और अन्य पारंपरिक व्यंजन भी बनाए जाते थे।
पड़ोसियों और रिश्तेदारों के घर पकवान भेजना भी त्योहार की परंपरा का हिस्सा था। बच्चे सुबह से ही मालपुए बनने का इंतजार करते थे।
गंगधार के बाजारों में भी हरियाली अमावस्या के दिन मालपुओं की विशेष रौनक रहती थी। चावड़ी बाजार में चांदू दादा, गोरधन दादा और नीमा की दुकानों, वहीं मालपुरा बाजार में दाऊ बा हलवाई की दुकान पर मालपुए और रबड़ी की खूब बिक्री हुआ करती थी।
बुजुर्ग बताते हैं कि उस दिन बाजारों में मालपुए और रबड़ी की खुशबू अलग ही माहौल बना देती थी। आज भी इन दुकानों पर इस पर्व की मिठास दिखाई देती है, लेकिन वह पुराना उत्साह और भीड़ अब पहले जैसी नहीं रही।
न मोबाइल था, न सोशल मीडिया… फिर भी खुशियां ज्यादा थीं
बुजुर्गों की यादों में वह दौर आज भी खास है। तब न मोबाइल फोन था, न सोशल मीडिया और न ही मनोरंजन के इतने साधन। लेकिन लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय था।
त्योहार परिवार को जोड़ते थे, पड़ोसी एक-दूसरे के घर जाते थे और महिलाएं समूह बनाकर सावन के गीत गाती थीं। बच्चों के लिए पूरा दिन खेल और मस्ती का होता था।
आज संदेश सेकंडों में पहुंच जाता है, लेकिन आमने-सामने बैठकर मिलने का समय कम होता जा रहा है।
पेड़ कम हुए तो झूले भी गायब हो गए
बदलती जीवनशैली ने हरियाली अमावस्या की परंपराओं को भी प्रभावित किया है। पेड़ों की संख्या कम हुई, घरों के आंगन छोटे हुए और दिनचर्या पहले से ज्यादा व्यस्त हो गई।
मोबाइल, टीवी और इंटरनेट ने मनोरंजन के पुराने साधनों की जगह ले ली। नतीजा यह हुआ कि पेड़ों पर पड़ने वाले झूले और सामूहिक सावन गीत धीरे-धीरे अतीत की याद बनते गए।
मालपुए आज भी बनते हैं, बाजारों में रबड़ी-मालपुए मिलते हैं, लेकिन त्योहार की वह सामूहिकता अब पहले जैसी दिखाई नहीं देती।
परंपराओं को फिर से जीवित करने की जरूरत
हरियाली अमावस्या सिर्फ प्रकृति और हरियाली का पर्व नहीं, बल्कि हमारी लोक संस्कृति और सामुदायिक जीवन की विरासत भी है। यदि गांव-कस्बों में सामूहिक पौधारोपण के साथ पारंपरिक झूले, सावन गीत और लोक संस्कृति से जुड़े आयोजन किए जाएं तो नई पीढ़ी को इन परंपराओं से दोबारा जोड़ा जा सकता है।
कभी सावन आते ही पेड़ों पर झूले पड़ जाते थे, अब सावन आता है तो उन झूलों की याद आती है।
कभी हर घर से मालपुओं की खुशबू आती थी, अब वही खुशबू बचपन की यादों में महसूस होती है।
हरियाली अमावस्या शायद यही याद दिलाती है कि खुशियों के लिए साधन नहीं, साथ चाहिए—और त्योहारों की असली खूबसूरती तभी है, जब उनमें परंपरा भी बचे और अपनापन भी।