लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
बदल रहा है राजस्थान, मरूधरा में हरियाली का आहृान
– आज लगेंगे ढाई करोड़ पौधे
– पिछले साल आज ही के दिन हुआ था 2 करोड़ पौधारोपण
– विकसित, हरित, आपणो अग्रणी राजस्थान
राजस्थान में वर्षा ऋतु का विशेष महत्व है। प्रचण्ड गर्मी के बाद बारिश का सुखद आगमन किसी उत्सव से कम नहीं होता है। रिमझिम फुहारों से धरती हरियाली का आंचल ओढ़ लेती है। उम्मीदों से भरे किसान खेतों में बुवाई-रोपाई में लग जाते हैं। युवा बारिश का आनंद लेने निकल पड़ते हैं। धरती पर जल और जीवन में रस का स्रोत फूट पड़ता है।
हर्ष और उल्लास के इस माहौल में आता है श्रावणी तीज का त्योहार। गांव-देहात में तो घर-घर में झूले पड़ जाते हैं तथा गीत गाए जाते हैं। सात वार, नौ त्योहार की हमारी संस्कृति में आज का दिन हरियाली तीज हमारे लोकजीवन की प्रकृति के साथ जुड़ाव की पराकाष्ठा का दिन है।
धार्मिक रूप से विचार करें तो मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक तपस्या की और 108वें जन्म में श्रावण शुक्ल तृतीया को उनकी तपस्या सफल हुई। वहीं दूसरी ओर यह दिन प्रकृति से प्रेम और पर्यावरण की रक्षा की प्रेरणा भी देता है। तीज ही नहीं, हमारे जितने भी त्योहार हैं, वे सब प्रकृति के अनुरूप हैं। मकर संक्रान्ति, वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, होली, नवरात्र, गुड़ी पड़वा, वट पूर्णिमा, ओणम, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा, शरद पूर्णिमा, अन्नकूट, देव उठनी एकादशी, गंगा दशहरा आदि सभी पर्व किसी न किसी रूप में प्रकृति से जुड़े हैं।
भारतीय संस्कृति में वृक्षों, नदियों और जलस्रोतों की पूजा का माहात्म्य माना गया है। जल और वायु को देवता मान कर इन्हें स्वच्छ व पवित्र रखने की बात कही गई है। यज्ञ, पूजा और अन्य धार्मिक कार्यों के समापन पर किए जाने वाले शांति पाठ में पृथ्वी, आकाश, जल, वनस्पति एवं औषधि में शांति की कामना की गई है। यहां आशय इन्हें प्रदूषण मुक्त, संरक्षित व सुरक्षित रखने से भी है। इस अर्थ में भारतीय संस्कृति को प्रकृति संरक्षण की परम्परा की जन्मदात्री कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
एक वृक्ष दस पुत्र समान- यह हम सबने सुना है। ग्रंथों में पेड़-पौधों का महत्व इससे भी बढ़ कर बताया गया है।
दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो ह्रदः।
दशह्रदसमो पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः।।
दस कुंए के समान एक बावड़ी, दस बावड़ी के समान एक सरोवर, दस सरोवर के समान एक पुत्र और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष का महत्त्व माना गया है। हमारी सरकार ने हरियाली तीज पर राज्य स्तरीय वन महोत्सव मनाते हुए पौधारोपण की परम्परा को और मजबूत करने की पहल की है ताकि पारंपरिक रूप से मरुभूमि के रूप में पहचान रखने वाला हमारा प्रदेश हरियालो राजस्थान के रूप में पहचान बना सके। ’एक पेड़ मां के नाम’ अभियान से प्रेरणा लेते हुए हमारी सरकार 5 वर्ष में 50 करोड़ पौधारोपण का लक्ष्य लेकर काम कर रही है। पिछले मानसून में 7 करोड़ से अधिक पौधे लगाए गए थे और इस वर्ष 10 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य लेकर हम चल रहे हैं। अब तक 3 करोड़ 60 लाख से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं।
पिछले साल हरियाली तीज पर हरियालो राजस्थान अभियान का शुभारंभ हुआ था। तब प्रदेशभर में एक ही दिन में 2 करोड़ से अधिक पौधे लगाए गए थे। इस वर्ष हरियाली तीज पर 2 करोड़ 50 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है। हर जिले में आमजन की भागीदारी से मातृ वन बनाए जा रहे हैं, जहां लोग अपने परिजनों की स्मृति में वृक्ष लगाकर पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। पौधों की जियो टैगिंग कर उनकी सुरक्षा एवं देखभाल सुनिश्चित की जा रही है। वन विभाग के अलावा अन्य विभागों, गैर सरकारी संस्थाओं, ग्राम पंचायतों, शहरी निकायों एवं आमजन को भी पौधे उपलब्ध करवाए जा रहे हैं, ताकि प्रदेश के हर जिले, हर शहर और हर गांव को व्यापक स्तर पर पौधारोपण से जोड़ा जा सके। वृक्षारोपण की दिशा में राज्य सरकार के सतत प्रयास रंग लाते दिखाई दे रहे हैं। राजस्थान वन एवं वृक्ष आवरण में 394 वर्ग कि.मी. बढ़ोतरी के साथ अधिकतम वृद्धि दर्शाने वाले शीर्ष चार राज्यों में शामिल हो गया है।
पर्यावरणीय चेतना जगाने के लिए सरकार की भूमिका अब केवल नीति तक सीमित नहीं रही है, बल्कि सक्रिय सहभागिता के साथ हरियाली और जल संरक्षण से जुड़े अभियानों की पहल की गई है। आमजन के अपार सहयोग से ये अभियान जन-आंदोलन का रूप ले चुके हैं। वंदे गंगा जल संरक्षण-जन अभियान से प्रदेशभर में जल स्त्रोतों की दशा में अभूतपूर्व सुधार हो रहा है। गंगा दशहरा पर अभियान की शुरूआत कर जल स्त्रोतों की पूजा-अर्चना को इसकी एक प्रमुख गतिविधि बनाया गया, ताकि आमजन में जल संस्कृति के प्रति झुकाव और जुड़ाव की अनुभूति हो। अभियान में लाखों लोग अपने घर से निकले और जल संरक्षण, श्रमदान, जल स्रोतों की स्वच्छता जैसे कार्यों से जुड़े। राजस्थान के परंपरागत जल-स्रोतों की संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए ‘कर्मभूमि से मातृभूमि’ अभियान की शुरुआत कर प्रवासी राजस्थानियों को उनके गांवों से जोड़ा जा रहा है। इस अभियान में प्रवासी राजस्थानी रिचार्ज शाफ्ट और जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण में आर्थिक और तकनीकी सहयोग दे रहे हैं। सीएसआर एवं दानदाताओं के सहयोग से कर्मभूमि से मातृभूमि अभियान में साढ़े चार हजार रिचार्ज शाफ्ट का निर्माण करवाया गया है। इन छोटे-छोटे कार्यों का भविष्य में निश्चित तौर पर बड़ा प्रभाव देखने को मिलेगा और प्रदेश के भू-जल स्तर में भी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।
श्री कृष्ण गमन पथ हो या आदिवासी टूरिज्म सर्किट, ग्रीन फील्ड हाइवे हो या दुनिया का सबसे बड़ा सोलर हब हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में हमारी हर पहल पर्यावरण संरक्षण, विरासत संरक्षण, सनातन की पताका फैलाने का काम कर रही है। हम अकेले कुछ नहीं कर सकते। यह राजस्थान की 8 करोड़ जनता का संकल्प है, जो सिद्धि की तरफ बढ़ रहा है।
