सीएस व डीजीपी की नियुक्ति में मनमानी, यूपीएससी का आखिर क्या है औचित्य ?

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लोक टुडे नेटवर्क

महेश झालानी

देश में पुलिस प्रशासन की सर्वोच्च पदों की नियुक्ति हमेशा से संवेदनशील मुद्दा रही है। सुप्रीम कोर्ट के 2006 के निर्देशों के बावजूद कई राज्य अपनी मर्जी से कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त कर रहे हैं। इस स्थिति ने यूपीएससी की भूमिका और औचित्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सैद्धांतिक रूप से, यूपीएससी वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की सूची तैयार करती है और राज्यों को सलाह देती है कि डीजीपी की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर की जाए। हालांकि व्यावहारिक धरातल पर देखा जाए तो कई राज्यों ने इस प्रक्रिया को दरकिनार किया है। उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसी सरकारें राजनीतिक और चुनावी प्राथमिकताओं के तहत वरिष्ठ अधिकारियों को दरकिनार कर कम वरिष्ठ अधिकारियों को कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त कर देती हैं।

पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लगता है?

विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद राज्यों की इस मनमानी ने यूपीएससी की सलाहकार भूमिका को सीमित कर दिया है, जिससे आयोग की साख और प्रासंगिकता पर भी प्रभाव पड़ा है। महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि यूपीएससी राज्य सरकार द्वारा भेजे पैनल में से ही वरिष्ठता के आधार पर तीन नामों का चयन करती है । इन्ही तीन नामो में से किसी एक व्यक्ति को डीजीपी नियुक्त करना होता है । जब तय ही राज्य सरकार को करना है तो यूपीएससी का औचित्य क्या है ?

यूपी में प्रशांत कुमार बहुत जूनियर होते हुए भी काफी समय तक कार्यवाहक डीजी के तौर पर पुलिस विभाग में सबसे अधिक रुतबे के साथ काबिज रहे । वर्तमान में डीजीपी भी 13 अधिकारियों की वरिष्ठता को लांघते हुए डीजीपी पर तैनात है । आखिर ऐसा विराधाभास क्यों ? जब यूपी का कार्यवाहक डीजीपी यूपीएससी की बैठक में शरीक हो सकता है तो तेलंगाना के डीजीपी से गुरेज क्यो ? हाल ही में एक पुलिस अधिकारी ने यूपीएससी पर टिप्पणी करते हुए उसे पालतू कुत्ते की संज्ञा दी है ।

झारखंड का उदाहरण इसके लिए चिंताजनक है। चुनाव की घोषणा के बाद राज्य सरकार ने कार्यवाहक डीजीपी को हटाने का कदम उठाया, जो चुनाव आयोग की निष्पक्षता बनाए रखने की दिशा में था। इस घटना ने यह साबित किया कि राज्यों के पास अंतिम निर्णय का अधिकार रहते हुए भी राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बिना उच्च पदों की नियुक्ति कठिन है।

डीजीपी की नियुक्ति के लिए स्पष्ट नियम

विशेषज्ञों का मानना है कि जिस तरह डीजीपी की नियुक्ति के लिए स्पष्ट नियम और वरिष्ठता आधारित मापदंड हैं, उसी तरह मुख्य सचिव और अन्य शीर्ष प्रशासनिक पदों के लिए भी समान मापदंड तय होने चाहिए। इससे नियुक्तियों में पारदर्शिता बढ़ेगी, राजनीतिक हस्तक्षेप कम होगा और वरिष्ठ अधिकारियों का मनोबल भी सुरक्षित रहेगा।

यूपीएससी की भूमिका वर्तमान में केवल सलाहकार तक सीमित है, जबकि वास्तविक निर्णय राज्य सरकार के हाथ में है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और वरिष्ठता के नियमों की अनदेखी राज्यों की मनमानी और प्रशासनिक अनियमितताओं को उजागर करती है। विशेषज्ञों के अनुसार, शीर्ष प्रशासनिक पदों की नियुक्ति में स्पष्ट नियम, निगरानी तंत्र और पारदर्शिता ही इस प्रणाली को मजबूत बना सकती है। केंद्र सरकार को चाहिए कि वह मुख्य सचिव और डीजीपी की नियुक्ति के लिए पूरे देश मे एक ही प्रकार का नियम लागू करें ताकि राज्य सरकारों की मनमानी पर अंकुश लग सके ।

यदि केंद्र राज्यो की स्वतंत्रता पर अतिक्रमण नही करना चाहती है तो राज्य सरकार को पूरी छूट प्रदान करें कि वह अपनी मर्जी से एक तय मापदण्ड के अनुरूप मुख्य सचिव और डीजीपी की नियुक्ति करें । इसके लिए यह मापदण्ड तय होना चाहिए कि सम्बन्धित अधिकारी की सेवानिवृति 6 महीने से अधिक हो तथा उसका न्यूनतम कार्यकाल एक वर्ष कम नही होना चाहिए । महाराष्ट्र में नियुक्त मुख्य सचिव राजेश मीणा की सेवानिवृति एक महीने बाद होने वाली है । बावजूद इसके उन्हें इसलिए मुख्य सचिव बनाया गया है क्योंकि वे भाजपा नेता जसकौर मीणा के दामाद है ।

राज्य सरकारों को उच्च पदों पर नियुक्ति देने से पहले यह भी देखना चाहिए कि बहुत ही कनिष्ठ अधिकारी को उच्च पद पर नही बैठाना चाहिए । जैसे भैरोसिंह शेखावत ने मीठालाल मेहता, अशोक गहलोत ने निरंजन आर्य तथा भजनलाल शर्मा ने सुधांश पन्त को मुख्य सचिव बनाया है । हालांकि वर्तमान में मुख्य सचिव की नियुक्ति के लिए कोई नियम नही है । जब डीजीपी के लिए नियम लागू है तो मुख्य सचिव इससे अछूते क्यों ?

जिस प्रकार भजनलाल ने राजीव शर्मा को वरिष्ठता के आधार पर डीजीपी बनाया है, वही नियम लागू होना चाहिए । लेकिन वरिष्ठता का यह मतलब भी नही होना चाहिए कि कोई भ्रस्ट या निकृष्ट छवि का अधिकारी इस आधार पर विशुद्ध रूप से नियुक्त नही होना चाहिए कि वह वरिष्ठ है । सरकार का संचालन मुख्य रूप से सीएस और डीजीपी करते है । इनकी नीतियां सरकार से मेल नही खाएगी तो रेलगाड़ी दौड़ने के बजाय डिरेल होने की पूरी संभावना रहेगी । इन दोनों पदों की नियुक्ति के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया जाना उचित रह सकता है ।

उच्च न्यायालय का न्यायाधीश, विपक्ष का नेता और मुख्यमंत्री इस कमेटी में शामिल होने चाहिए ताकि नियुक्ति में पारदर्शिता बनी रहे । यदि उमराव सालोदिया जैसे व्यक्ति मुख्य सचिव बन जाते है तो प्रदेश का बेड़ा गर्क होने से कोई नही रोक सकता है । इसी तरह सुबोध अग्रवाल वरिष्ठता के आधार पर आज मुख्य सचिव बन जाते तो प्रदेश को ही बेच डालते ।

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