बया वीवर की अनुपम सुंदरता और कारीगरी: दीपक मुदगल

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

भरतपुर। का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, जिसे पक्षी विहार के नाम से जाना जाता है, पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान है। यहाँ की हरी-भरी हरियाली और शांत तालाबों के बीच देश-विदेश के रंग-बिरंगे पक्षी आकर्षण का केंद्र हैं। मानसून के मौसम में यहाँ का प्राकृतिक परिवेश अपनी अनुपम छटा बिखेरता है। इन सबके बीच, छोटा सा बया वीवर पक्षी, जिसे बुनकर पक्षी भी कहा जाता है, अपनी अनोखी घोंसला बुनाई की कला से सभी का मन मोह लेता है।

वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर और नगर निगम पार्षद दीपक मुदगल ने दो माह के अथक प्रयास और गहन अवलोकन के बाद बया वीवर के जीवन, व्यवहार और कारीगरी को अपनी तस्वीरों और अध्ययन में खूबसूरती से उकेरा है।
प्रजनन काल में नर बया वीवर का सिर और गला चमकीला पीला-नारंगी, चेहरा काला और शरीर भूरा होता है, जो उसे अत्यंत आकर्षक बनाता है। अन्य समय में नर और मादा दोनों गौरैया जैसे भूरे और धारीदार दिखते हैं। इनकी छोटी, मजबूत चोंच बीज, अनाज और कीट खाने के लिए उपयुक्त होती है।
बया वीवर खजूर और बबूल के पेड़ों पर, विशेषकर जल स्रोतों के निकट, घास, पत्तियों और पौधों के रेशों से बोतलनुमा लटकते घोंसले बनाते हैं। नर अथक परिश्रम से इन जटिल घोंसलों को बुनता है, जिनमें एक लंबी प्रवेश नली होती है। ये घोंसले शिकारियों, जैसे साँपों, और बारिश से सुरक्षा प्रदान करते हैं। मादा इन घोंसलों का बारीकी से निरीक्षण करती है और सबसे उत्कृष्ट घोंसले का चयन करती है। नर द्वारा बनाए गए घोंसले यदि मादा को पसंद नहीं आते, तो वह उन्हें तोड़कर नए सिरे से निर्माण करता है। यह प्रक्रिया उसकी मेहनत और समर्पण का प्रतीक है।

बया वीवर बीज, चावल, अनाज और कीटों का सेवन करते हैं। प्रजनन काल में ये कीटों का अधिक भक्षण करते हैं, जो पर्यावरण में कीट नियंत्रण में महत्वपूर्ण योगदान देता है। समूह में रहने की उनकी आदत उनकी सामाजिकता को दर्शाती है। नर अपनी बुनाई कला से मादाओं को आकर्षित करते हैं और कई घोंसले बनाकर अपनी कुशलता का प्रदर्शन करते हैं।
स्थानीय संस्कृति में बया वीवर के घोंसले मेहनत, कला और प्रकृति की रचनात्मकता के प्रतीक माने जाते हैं। प्रजनन काल के बाद खाली हो चुके इन मजबूत घोंसलों को लोग सजावट के लिए उपयोग करते हैं। प्रत्येक प्रजनन काल में ये पक्षी नए घोंसले बनाते हैं, जो उनकी निरंतर रचनात्मकता को दर्शाता है।

दीपक मुदगल का यह प्रयास न केवल बया वीवर की कारीगरी और सुंदरता को उजागर करता है, बल्कि जैव-विविधता और पर्यावरण संतुलन के महत्व को भी रेखांकित करता है। उनके अनुसार, अजान बांध, कुम्हेर रोड, बृज विश्वविद्यालय और रूपबास जैसे क्षेत्रों में बया वीवर के दर्शन और उनकी कला को निहारने का अनुपम सुख प्राप्त किया जा सकता है।
यह कारीगरी प्रकृति की अनमोल देन है, जो हमें पर्यावरण संरक्षण और जैव-विविधता के प्रति जागरूक होने की प्रेरणा देती है।

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