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बाल मजदूरी से कब मिलेगा छुटकारा?

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

झालावाड़।
झालावाड़ जिले का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कामखेड़ा बालाजी धाम इन दिनों गलत कारणों से सुर्खियों में है। धार्मिक आस्था के इस केंद्र पर शनिवार और मंगलवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन इनके बीच कई मासूम बच्चे मजदूरी करते हुए दिखाई देते हैं।

पुलिस थाने के ठीक सामने और बाजारों में खुलेआम बाल मजदूरी का कारोबार चलता है। चाय परोसते, फूल-मालाएं बेचते, तिलक लगाकर पैसे मांगते और सड़क किनारे काम करते बच्चे यहां आम नजारा बन चुके हैं।

गरीबी और मजबूरी का बोझ

गरीबी और मजबूरी इन बच्चों से उनका बचपन छीन लेती है। जब उन्हें पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद में होना चाहिए, तब वे पेट की आग बुझाने के लिए होटलों, ढाबों, पंचर की दुकानों, किराना और कपड़े की दुकानों पर काम करते मिलते हैं।

शिक्षा से वंचित बचपन

‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और शिक्षा का अधिकार जैसी सरकारी योजनाओं के दावों के बावजूद जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। बाल मजदूरी के कारण बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है। जिस उम्र में वे किताबों और खेलों में व्यस्त होने चाहिए, उस उम्र में वे मजदूरी में झोंक दिए जाते हैं।

शोषण और खतरे

बाल मजदूर अक्सर मालिकों द्वारा शोषण का शिकार बनते हैं। कम मजदूरी पर लंबे समय तक काम कराया जाता है। कई बार इन्हें खतरनाक जगहों जैसे कारखानों, खदानों और होटलों में भी काम करना पड़ता है, जिससे उनकी जान को भी खतरा रहता है।

बड़ा सवाल

कामखेड़ा जैसे धार्मिक स्थल पर बाल मजदूरी का खुलेआम चलना प्रशासन और समाज दोनों के लिए सवाल खड़े करता है। आखिर कब इन मासूम बच्चों को उनका हक — शिक्षा, बचपन और सुरक्षित भविष्य — मिल पाएगा?

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