लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
परमात्मा के बनाए खूबसूरत जगत का विवेकपूर्ण सदुपयोग करें: सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज
आत्ममंथन की दिव्य शिक्षा लेकर लौटे स्थानीय श्रद्धालु
भीलवाड़ा। (पंकज पोरवाल)
“निराकार परमात्मा ने जो यह जगत बनाया है, उसकी हर वस्तु अत्यंत खूबसूरत है। मनुष्य इस रचना का आनंद तो अवश्य ले, पर अपनी विवेक बुद्धि जागृत रखकर इसका सदुपयोग करे, दुरुपयोग नहीं।” यह पावन संदेश सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज ने 78वें वार्षिक निरंकारी संत समागम के समापन अवसर पर दिया।
सतगुरु माता ने कहा कि आत्ममंथन ही जीवन की कठिनाइयों को सीमित कर मन को तनावमुक्त बनाता है। जब मनुष्य हर कर्म में ईश्वर का अहसास रखता है, तो उसके जीवन में शांति, संतुलन और आत्मिक विकास स्वतः आता है।
उन्होंने दृष्टिकोण के महत्व को उदाहरण के माध्यम से समझाते हुए कहा कि एक ही बगीचे में कोई व्यक्ति कांटों को देख उदास होता है, जबकि दूसरा उन्हीं फूलों की सुंदरता में प्रसन्नता खोज लेता है। जीवन में सुख-दुख का अंतर केवल हमारे नज़रिये पर निर्भर है। इसलिए भक्त को सदैव सकारात्मकता और गुणों का ग्राहक बने रहना चाहिए।
सतगुरु माता ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि समागम में मिली दिव्य सिखलाई को अपने जीवन में आत्मसात करें और अच्छाई के इस संदेश को पूरी मानवता तक पहुँचाएँ।
भीलवाड़ा ज़ोनल इंचार्ज संत ब्रजराज सिंह ने बताया कि आत्ममंथन की शिक्षा से प्रेरित होकर श्रद्धालु जगत कल्याण की दिशा में अग्रसर होने का संकल्प लेकर लौटे।
समापन सत्र में समागम कमेटी के समन्वयक एवं संत निरंकारी मंडल के सचिव जोगिंदर सुखीजा ने सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज एवं निरंकारी राजपिता के दिव्य आशीषों के लिए कृतज्ञता व्यक्त की और सरकारी विभागों सहित सभी सहयोगी संगतों का धन्यवाद किया।
इस वर्ष समागम के चारों दिनों में ‘आत्ममंथन’ विषय पर कवि दरबार आयोजित हुए, जिनमें देशभर से आए 38 कवियों ने हिंदी, पंजाबी, हरियाणवी, उर्दू, मराठी आदि भाषाओं में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। श्रोताओं ने कविताओं का भरपूर आनंद लिया और आत्मसुधार के इस दिव्य संदेश को आत्मसात किया।











































