आपदाओं की ओर बढ़ती देवभूमि उत्तराखंड: अब नहीं चेते तो देर हो जाएगी

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क 

सत्यनारायण सेन, गुरला

उत्तराखंड में लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं केवल पर्यावरणीय घटनाएं नहीं हैं, अपितु वे हमारे विकास मॉडल, नीति-निर्धारण एवं प्रकृति के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं

सजग एवं सक्षम बनाया जा सके।

चतुर्थ, पर्वतीय पर्यटन को इको-टूरिज्म में परिवर्तित करने की दिशा में गंभीर प्रयास होने चाहिए। पर्यटन गतिविधियाँ पर्यावरण-संवेदनशील, सीमित और विनियमित हों, ताकि पारिस्थितिक संतुलन बना रहे।

उत्तराखंड में लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं केवल पर्यावरणीय घटनाएं नहीं हैं, अपितु वे हमारे विकास मॉडल, नीति-निर्धारण एवं प्रकृति के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं। भूस्खलन, बाढ़, बादल फटना, वनाग्नि और भू-धंसाव जैसी घटनाएँ न केवल राज्य की पारिस्थितिकी को, बल्कि उसकी सामाजिक और आर्थिक संरचना को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर रही हैं।

यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन तथा मानवीय हस्तक्षेप की संयुक्त परिणति ने उत्तराखंड को आपदा-प्रवणता की चरम सीमा तक पहुँचा दिया है। ऐसी परिस्थिति में मात्र तात्कालिक राहत उपाय पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता है एक दीर्घकालिक, पर्यावरण-संवेदी और समुदाय-आधारित नीति दृष्टिकोण की, जो विकास को प्रकृति के साथ सहअस्तित्व के रूप में पुनर्परिभाषित करे।

इस दृष्टिकोण में सतत विकास, पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय भागीदारी और वैज्ञानिक विवेक का संतुलन अनिवार्य है। उत्तराखंड की जैव-विविधता, सांस्कृतिक धरोहर और संवेदनशील पारिस्थितिकी की रक्षा हेतु यह अत्यावश्यक है कि हम अब सजग होकर ठोस कार्यवाही करें।

अतः, राज्य सरकार, वैज्ञानिक संस्थान, गैर-सरकारी संगठन और स्थानीय समुदायों को मिलकर एक साझा, समावेशी और पर्यावरणोन्मुख दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। जब तक विकास को ‘प्रकृति-विरोधी लाभ’ के बजाय ‘प्रकृति-संगत जीवन’ के रूप में पुनर्परिभाषित नहीं किया जाएगा, तब तक उत्तराखंड की आपदाएं निरंतर तीव्र होती रहेंगी।

यही समय है जब हमें चेतने, सीखने और ठोस बदलाव लाने की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। अन्यथा वह समय दूर नहीं जब ‘देवभूमि’ की पहचान केवल त्रासदियों और आपदाओं तक सीमित होकर रह जाएगी। हमें अब ‘प्रकृति के अनुरूप विकास’ की राह अपनाने का सार्थक संकल्प लेना होगा, इसी में उत्तराखंड की दीर्घकालिक सुरक्षा और समृद्धि निहित है

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