लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी की कलम से
“एक अनदेखे की अनसुनी पुकार”
किसी पुरानी हस्तलिपि की तरह, मानव इतिहास भी टेढ़े-मेढ़े शब्दों से भरा हुआ है। कभी युद्ध, कभी प्रेम, कभी विज्ञान, कभी श्रद्धा। और इस पूरी कहानी में एक किरदार है जो कभी सामने नहीं आता, मगर हर मोड़ पर मौजूद रहता है — ईश्वर।
पूछा गया, “क्या ईश्वर है?”
उत्तर मिला, “सिद्ध करो!”
विज्ञान ने सूक्ष्मतम कण को देख लिया, ब्रह्मांड की ध्वनि को माप लिया, मगर उस मौन को नहीं तोड़ सका — जो प्रार्थना में होता है।
तर्क के तराजू पर परमात्मा
तर्कशास्त्र कहता है — “जो दिखता नहीं, वो होता नहीं।”
मगर क्या प्रेम दिखता है? क्या मृत्यु से पूर्व भय को कोई तराजू नाप सका है?
क्या आत्मा की पुकार को किसी माइक्रोस्कोप में देखा गया है?
नहीं, फिर भी ये सब हम मानते हैं — क्योंकि हम अनुभव करते हैं।
यही बात धर्म के लिए भी सत्य है।
भगवान, अल्लाह, ईश्वर — ये केवल नाम नहीं, ये अनुभव हैं। और अनुभव तर्क के नहीं, संवेदना के विषय होते हैं।
विज्ञान की सीमा, आस्था की परिधि
न्यूटन ने कहा — “प्रकृति नियमबद्ध है।”
हॉकिंग ने कहा — “ब्रह्मांड के पीछे कोई ईश्वर नहीं हो सकता।”
परंतु अंतिम वर्षों में वही हॉकिंग अपने बयान से हिलते दिखे।
आइंस्टीन कहते हैं — “Science without religion is lame, religion without science is blind.”
उनके लिए ईश्वर ब्रह्मांडीय व्यवस्था का नाम था।
हर वैज्ञानिक जैसे ही अज्ञात के किनारे पर आता है, वहाँ तर्क चुप हो जाता है, और प्रश्नकर्ता श्रद्धालु बन जाता है।
धर्म क्यों जीवित है?
यदि धर्म केवल कपट होता, तो वह सदियों की आलोचना और युद्धों के बावजूद जीवित न रहता।
अगर ईश्वर केवल भ्रम होता, तो वह मनुष्य की अंतिम सांस तक उसका सहारा न बनता।
धर्म मरता नहीं, क्योंकि वह उत्तर नहीं — बल्कि प्रश्न करने की प्यास है।
वह कहता है — “तू खुद को जान, बाकी सब जान जाएगा।”
ईश्वर एक प्रयोग नहीं — एक अनुभव है
बुद्ध ने ईश्वर का नाम नहीं लिया, मगर ध्यान सिखाया।
कबीर ने मस्जिद- मंदिर सबको ठुकराया, पर “राम” को पुकारा — उस राम को जो किसी धर्म की बपौती नहीं।
गुरु नानक ने कहा — “एक ओंकार सतनाम”, और सूफियों ने गाया — “तेरा नाम इश्क़ रखा…”
इन सबने परमात्मा को देखा नहीं, पर महसूस किया।
जैसे सूरज को आँखें नहीं देख पातीं, लेकिन उसकी रौशनी से सब दिखता है।
नकारने की सीमा और स्वीकार की शक्ति
विज्ञान कहता है — “तब तक मत मानो, जब तक सिद्ध न हो जाए।”
धर्म कहता है — “तब तक खोजो, जब तक अनुभव न हो जाए।”
इसलिए विज्ञान तथ्यों तक पहुंचता है, जबकि धर्म सत्य तक।
विज्ञान प्रमाण चाहता है, धर्म प्रतीति।
और यही कारण है कि अब तक कोई भी वैज्ञानिक, दार्शनिक या तर्कशास्त्री धर्म को पूरी तरह नकार नहीं सका।
क्योंकि जैसे ही वे अंतिम द्वार तक पहुँचते हैं, उन्हें सामने मिलता है — एक मौन… एक आलोक… एक उपस्थिति, जिसे शब्द नहीं बाँध सकते।
मौन का सबसे बड़ा प्रमाण
ईश्वर का अस्तित्व इसीलिए नहीं है कि उसने खुद को सिद्ध किया,
बल्कि इसीलिए है कि वह हर उस क्षण में मौजूद है जब विज्ञान मौन हो जाता है,
जब तर्क झुक जाता है,
और जब आत्मा कह उठती है — “तू है… मैं जानता हूँ, क्योंकि मैंने तुझे अपने भीतर देखा है










































