लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली/जयपुर:
भारत की प्राचीन पर्वतमाला अरावली के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने अरावली क्षेत्र में नई खनन लीज़ जारी करने पर रोक लगाते हुए केंद्र सरकार को “सतत (सस्टेनेबल) खनन प्रबंधन योजना” तैयार करने का निर्देश दिया है। जब तक यह योजना तैयार नहीं हो जाती, तब तक किसी भी नई खान को मंजूरी नहीं दी जाएगी।
अदालत ने कहा कि यह योजना पर्यावरण-अनुकूल खनन ढांचे, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और पारिस्थितिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए बनाई जानी चाहिए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि मौजूदा वैध खनन गतिविधियां, यदि वे नियमों और पर्यावरणीय शर्तों के अनुरूप हैं, तो जारी रह सकती हैं। कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की भौगोलिक अखंडता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने पर विशेष जोर दिया।
राजनीतिक और पर्यावरणीय प्रतिक्रियाएं
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद राजनीतिक और पर्यावरणीय हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
पूर्व राजस्थान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस फैसले को “पर्यावरणीय विनाश का न्योता” करार दिया। उन्होंने आशंका जताई कि अदालत द्वारा स्वीकार की गई ऊँचाई आधारित नई परिभाषा के कारण अरावली का लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो सकता है, जिससे अवैध खनन और वनों की कटाई बढ़ने का खतरा है।
वहीं वरिष्ठ वकीलों और अमीकस क्यूरीए ने भी चिंता जताते हुए कहा है कि अरावली का संरक्षण अनिवार्य है और नई परिभाषा पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए, ताकि छोटी पहाड़ियां और पहाड़ी श्रृंखलाएं भी पर्यावरणीय संरक्षण के दायरे में बनी रहें।
सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों का कहना है कि यदि खनन पर निगरानी कमजोर पड़ी, तो इसका जल स्रोतों, जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी पर लंबे समय तक नकारात्मक असर पड़ेगा।

क्या बदलेगा? (मुख्य बिंदु)
-
सुप्रीम कोर्ट ने सतत खनन प्रबंधन योजना बनाने का आदेश दिया
-
नई खनन लीज़ पर फिलहाल पूर्ण रोक
-
मौजूदा वैध खनन कार्य नियमों के तहत जारी रहेंगे
-
विशेषज्ञों को आशंका कि नई परिभाषा से छोटी पहाड़ियों पर खनन का रास्ता खुल सकता है

अरावली में खनन पर कोर्ट आदेश के परिणाम: पर्यावरण से अर्थव्यवस्था तक असर
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के दूरगामी परिणाम होंगे, जो पर्यावरण, जल संसाधन, स्थानीय आजीविका और प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करेंगे।
पर्यावरणीय प्रभाव
-
नई खानों पर रोक से अरावली को और नुकसान रुक सकता है
-
वन कटाई और जैव विविधता क्षरण पर नियंत्रण की संभावना
-
लेकिन सीमित परिभाषा से कुछ क्षेत्र संरक्षण से बाहर रह सकते हैं

जल संकट पर असर
-
अरावली उत्तर भारत के लिए भूजल रिचार्ज की रीढ़ है
-
खनन सीमित होने से जलस्तर गिरावट की रफ्तार कम हो सकती है
-
अनियंत्रित खनन से कुएं-तालाब सूखने का खतरा
प्रदूषण और जलवायु
-
खनन घटने से धूल प्रदूषण में कमी
-
दिल्ली-एनसीआर की हवा की गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद
-
अरावली कमजोर हुई तो मरुस्थलीकरण और तापमान बढ़ सकता है

स्थानीय आजीविका
-
अल्पकाल में खनन मजदूरों पर रोजगार का दबाव
-
दीर्घकाल में ईको-टूरिज्म, वन आधारित रोजगार और खेती को लाभ
⚖ कानूनी और प्रशासनिक असर
-
केंद्र व राज्य सरकारों पर सख्त नीति बनाने का दबाव
-
पर्यावरणीय मंजूरी और निगरानी प्रणाली मजबूत करनी होगी
-
कमजोर क्रियान्वयन से अवैध खनन बढ़ने का खतरा

अरावली में खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकारें वैज्ञानिक, पारदर्शी और सख्त सतत खनन नीति को कितनी प्रभावी ढंग से लागू करती हैं। सही क्रियान्वयन हुआ तो यह फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए अरावली को बचाने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।










































