लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
ACP दया नायक की विदाई”
हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
“वर्दी को पहनना आसान होता है, पर उसे खून से बचाकर इज्ज़त से उतारना – ये सिर्फ़ कुछ ही लोग कर पाते हैं।”
महाराष्ट्र पुलिस के ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के नाम से विख्यात ACP दया नायक गुरुवार को 31 वर्षों की सेवा के बाद रिटायर हो गए। जिनकी वर्दी पर कभी खून के छींटे थे, आज वह वर्दी सम्मान और इतिहास की गवाही बन गई। दया नायक का नाम सिर्फ़ पुलिस फाइलों में नहीं, बल्कि मुंबई की अंधेरी गलियों से लेकर अपराध की राजधानी रहे डोंगरी तक गूंजता है।
जब कानून का हाथ छोटा पड़ जाए, तब एक इरादा खड़ा होता है
भारत की पुलिस व्यवस्था हमेशा से दो धाराओं में बटी रही है – एक जो क़ानून की किताबों से चलती है और दूसरी जो हालातों के मुताबिक़ निर्णय लेती है। दया नायक दूसरी धारा के प्रतिनिधि थे। ऐसे अधिकारी जिनके लिए हर अपराधी के चेहरे पर देश के भविष्य की लाश दिखती थी।
उनके नाम 80 से अधिक एनकाउंटर दर्ज हैं।
ये सिर्फ़ एक संख्या नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर एक टिप्पणी है, जहां अदालतों से पहले गोलियां इंसाफ करती हैं। क्या ये सही है? ये सवाल बहस के लिए हो सकता है, लेकिन एक बात तय है – दया नायक ने जिस ज़मीन पर कदम रखा, वहां से गैंगस्टर या तो भागे या फिर मिट गए।
एनकाउंटर स्पेशलिस्ट: नायक या खलनायक?
कुछ मानवाधिकार संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता वर्षों से इस मॉडल की आलोचना करते आए हैं – कि क्या पुलिस को न्यायपालिका के ऊपर निर्णय लेने का अधिकार है? परंतु जब जुर्म की रफ्तार कानून की प्रक्रिया को पीछे छोड़ दे, तब शायद ‘नायक’ जैसे लोग ही समाज को थामते हैं।
दया नायक को मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच और एटीएस जैसे संवेदनशील विभागों में भी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां मिलीं। उन्होंने न केवल गोलियों से, बल्कि रणनीति से भी कई गैंगवार खत्म किए। उन्हें पदोन्नति देकर रिटायरमेंट से दो दिन पहले ACP बना दिया गया – एक ऐसे अधिकारी को सम्मानित करने के लिए जिसने न कभी प्रचार चाहा, न ही मीडिया के सामने हीरो बनने की कोशिश की।
एनकाउंटर का दूसरा पहलू – लोकतंत्र की सीमा रेखा
यह भी सत्य है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को न्याय का साधन होना चाहिए, न्याय का निर्णयकर्ता नहीं। दया नायक जैसे अफसरों की ज़रूरत शायद एक बीमार व्यवस्था की मजबूरी है। जहां अदालती प्रक्रिया धीमी हो, गवाह डरते हों और माफिया राज चलता हो, वहां ‘एनकाउंटर’ एक व्यवस्था की चुप स्वीकृति बन जाता है।
लेकिन हमें यह भी पूछना होगा — क्या इस व्यवस्था को ठीक करने का प्रयास किया गया? क्या हमें ऐसे नायकों की ज़रूरत ही नहीं पड़नी चाहिए?
दया नायक की विरासत: भय और भरोसे के बीच की एक रेखा
उनकी सेवानिवृत्ति सिर्फ़ एक अधिकारी की विदाई नहीं है, यह एक सोच का रिटायरमेंट है। आज जब युवा पुलिसकर्मी सोशल मीडिया पर छाए रहना चाहते हैं, दया नायक अपने काम से ही बोले। वह नायक थे – सख़्त, चुप, मगर ईमानदार।
उनका जीवन एक आइना है – जिसमें सिस्टम की लाचारी, पुलिस की हिम्मत और एक इंसान का खतरों से खेलना सब कुछ दिखता है। एक ओर वह ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ थे, दूसरी ओर एक साधारण, सच्चे देशभक्त।
क्या हम अगला दया नायक बना रहे हैं?
दया नायक के रिटायरमेंट के बाद सवाल यह नहीं कि उन्होंने कितने अपराधियों का खात्मा किया, बल्कि यह है कि क्या हमने ऐसे सिस्टम को बदला है जो हर दशक में एक ‘दया नायक’ को जन्म देता है?
क्या हम एक ऐसे भारत की ओर बढ़ रहे हैं, जहां पुलिस गोलियों की नहीं, भरोसे की ज़ुबान बोले?
ACP दया नायक अब पुलिस में नहीं हैं, लेकिन उनके पीछे एक लंबी छाया छूट गई है – जिसे आने वाली पीढ़ी या तो डर की तरह याद रखेगी, या आदर्श की तरह अपनाएगी।
“शायद हर व्यवस्था को अपना एक दया नायक चाहिए होता है – क्योंकि कभी-कभी, न्याय को जीवित रखने के लिए न्याय से बाहर जाना पड़ता है।”










































