लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
अशोक गहलोत को पार्टी के शीर्ष नेताओं का भी समर्थन नहीं, अरावली मुद्दे पर कर रहे राजनीतिक दिखावा : राजेंद्र राठौड़
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जयपुर। (रूपनारायण सांवरिया)
जयपुर। भारतीय जनता पार्टी प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता में पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि अरावली पर्वतमाला जैसे गंभीर पर्यावरणीय विषय पर अशोक गहलोत द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार के खिलाफ भ्रम फैलाया जा रहा है, जो दुर्भाग्यपूर्ण और तथ्यहीन है।
राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि करीब ढाई अरब वर्ष पुरानी, विश्व की सबसे प्राचीन 700 किलोमीटर लंबी अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर जो परिभाषा तय की गई है, वह पूरी तरह से माननीय सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट और लिखित आदेशों पर आधारित है। इसमें किसी भी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अरावली हिल्स को लेकर 100 मीटर ऊंचाई का मानदंड कोई नया नहीं है, बल्कि यह मानक कांग्रेस शासनकाल में ही तय किया गया था और वर्षों तक लागू भी रहा।
राठौड़ ने बताया कि 8 अप्रैल 2005 को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अनुपालना में 100 मीटर से अधिक ऊंचाई को ‘हिल’ मानने का मानदंड तय हुआ था। इसके बाद 9 जनवरी 2006 से राजस्थान में ऐसी पहाड़ियों पर खनन पट्टे देना बंद कर दिया गया। इसके बावजूद अशोक गहलोत द्वारा यह कहना कि केंद्र सरकार ने अरावली को 100 मीटर में सीमित कर दिया है, पूरी तरह तथ्यात्मक रूप से गलत है।
उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध खनन को लेकर एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ एवं टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ मामलों में सुनवाई करते हुए 9 मई 2024 को दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के सचिवों एवं विशेषज्ञों की समिति गठित की थी। समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही 20 नवंबर 2025 को अंतिम निर्णय आया, जिससे यह स्पष्ट है कि पूरा निर्णय न्यायिक और वैज्ञानिक आधार पर लिया गया है।
पूर्व नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि अशोक गहलोत द्वारा यह दावा करना कि “90 प्रतिशत अरावली समाप्त हो जाएगी” पूरी तरह भ्रामक है। वास्तविकता यह है कि अरावली क्षेत्र का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा अभयारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों और आरक्षित वनों में आता है, जहां खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके अलावा केवल लगभग 2.56 प्रतिशत क्षेत्र ही सीमित और कड़े नियमों के तहत खनन के दायरे में आता है।
राठौड़ ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्टरी रिसर्च एंड एजुकेशन द्वारा अरावली क्षेत्र की विस्तृत वैज्ञानिक मैपिंग और सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान तैयार नहीं हो जाता, तब तक कोई नया खनन पट्टा जारी नहीं किया जा सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि 100 मीटर का मानदंड केवल ऊंचाई तक सीमित नहीं है। 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों, उनकी ढलानों तथा दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के क्षेत्र में आने वाली सभी भू-आकृतियों को खनन से पूरी तरह बाहर रखा गया है। यह व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक सख्त और वैज्ञानिक है।
राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि अशोक गहलोत ने “Save Aravalli” अभियान के नाम पर सोशल मीडिया पर दिखावटी राजनीति की, लेकिन न तो कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, न राहुल गांधी, न मल्लिकार्जुन खड़गे और न ही सचिन पायलट ने उनका समर्थन किया। इससे साफ है कि इस अभियान में खुद उनकी पार्टी के शीर्ष नेता भी साथ नहीं हैं। 
उन्होंने कहा कि जब किसी मुद्दे पर पार्टी के वरिष्ठ नेता भी समर्थन न करें, तो स्पष्ट हो जाता है कि यह पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि राजनीतिक दिखावा है। अरावली जैसे संवेदनशील विषय पर प्रतीकात्मक राजनीति नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेशों और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर ठोस कार्रवाई आवश्यक है।
राठौड़ ने बताया कि सर्वे ऑफ इंडिया के विश्लेषण के अनुसार इस परिभाषा के लागू होने से खनन में बढ़ोतरी नहीं, बल्कि और अधिक सख्ती आएगी। वर्तमान में अरावली क्षेत्र के 37 जिलों में कुल भौगोलिक क्षेत्र का केवल 0.19 प्रतिशत हिस्सा ही कानूनी खनन पट्टों के अंतर्गत है।
अंत में उन्होंने कहा कि केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव भी स्पष्ट कर चुके हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से अरावली पर्वतमाला पर कोई आंच नहीं आएगी। सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है कि अरावली सुरक्षित और संरक्षित रहे।
अरावली सुरक्षित है और रहेगी—सरकार का रुख स्पष्ट है कि पर्यावरण संतुलन और कानून का पालन सर्वोपरि है।
प्रेसवार्ता में विधायक कुलदीप धनकड़, महेंद्र पाल मीणा एवं प्रदेश मीडिया प्रभारी प्रमोद वशिष्ठ भी उपस्थित रहे।










































