लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
51 बालिकाओं को भोजन, 101 पौधों से सजावट कर दिया हरियाली का संदेश
भीलवाड़ा। (पंकज पोरवाल) आधुनिक दौर में जहाँ शादियों में तड़क-भड़क और दिखावे की होड़ बढ़ रही है, वहीं शहर के माली समाज के रागशिया परिवार ने एक सादगीपूर्ण, संस्कारित और पर्यावरण-संरक्षण से जुड़ा अनूठा आयोजन कर मिसाल पेश की।
माली समाज के नोहरे में आयोजित सुपौत्र नंदलाल और मूली देवी के सुपौत्र तेजपाल रागशिया के विवाह समारोह में कई विशिष्ट परंपराएँ सभी के आकर्षण का केंद्र रहीं।
गौ पूजन से हुई स्नेहभोज की शुरुआत
स्नेहभोज से पूर्व वर-वधू ने विधि-विधान से गौ माता का पूजन किया। इस अवसर पर महंत बनवारी शरण (काठिया बाबा) उपस्थित रहे। आचार्य धर्मेश व्यास व उनकी टीम ने पूजन विधि संपन्न कराई, जिसके बाद गौ माता को लापसी का भोग लगाया गया।
समाज सेवा से जुड़ी परंपराएँ
तेजपाल के विवाह पर 51 बालिकाओं को भोजन कराकर समारोह की औपचारिक शुरुआत हुई। विवाह में अयोध्या में रामलला की धर्मध्वजा फहराने की खुशी को भी सुंदर रूप में शामिल किया गया। प्रवेश द्वार पर रामलला की प्रतिमा स्थापित की गई, जहां दर्शन करने के बाद ही मेहमानों ने भोजन ग्रहण किया।
अतिथियों का स्वागत जगदीश–बाली देवी एवं तुलसीराम–लाड़देवी ने परंपरागत विधि से किया।
पर्यावरण संरक्षण को समर्पित सजावट
कार्यक्रम की सजावट समारोह का विशेष आकर्षण रही। वर-वधू की बहनें—राधा, पूजा, गायत्री और संतोष—ने विभिन्न प्रकार के पौधों से सजावट की। 101 पौधों से हरियाली का संदेश देते हुए पूरे विवाह स्थल को प्राकृतिक रूप से सजाया गया। पूरा आयोजन असली पौधों से सुसज्जित था, जिससे पर्यावरण संरक्षण का संदेश प्रभावी रहा।
संस्कारों से जुड़ा प्रेरणादायक आयोजन
कार्यक्रम में कई संत, सामाजिक संगठन, शहर विधायक और प्रमुख समाजसेवी उपस्थित रहे। सभी ने रामलला की प्रतिमा, गौ पूजन और आदियोगी की तस्वीर के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
गोविंद माली ने बताया कि छोटे भाई के विवाह में किए गए इस सनातन परंपराओं पर आधारित नवाचार की सभी ने सराहना की। उन्होंने कहा कि पुराने समय में विवाह समारोहों में गौ पूजन की परंपरा होती थी, जो समय के साथ कम होती जा रही थी, लेकिन इस आयोजन ने इस परंपरा को फिर से जीवंत कर दिया।
गौ माता के पूजन से कार्यक्रम अत्यंत पावन और सकारात्मक ऊर्जा से भरा रहा।
गोविंद और चेतन माली ने विवाह उपलक्ष्य में गौशाला के लिए दवाइयाँ व दलिया भिजवाने का संकल्प भी लिया।
इस तरह का आयोजन यह संदेश देता है कि आधुनिक दौर में भी परंपरा, धर्म और संस्कृति के साथ तालमेल रखते हुए भव्य व प्रेरणादायक आयोजन संभव हैं। यह विवाह समारोह समाज के लिए एक उदाहरण बनकर सामने आया है।













































