लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
हादसे में खोई आंखों की रोशनी, पर नहीं हारा हौसला
राजसमन्द | संवाददाता: गौतम शर्मा
राजसमन्द जिले की फियावड़ी पंचायत के खातीखेड़ा गांव के 41 वर्षीय नंदलाल सुथार, पुत्र छगनलाल सुथार, ने यह साबित कर दिया है कि अगर मन में हिम्मत और जज़्बा हो, तो कोई भी मुश्किल इंसान को उसके रास्ते से नहीं रोक सकती।
करीब साढ़े पांच साल पहले हुए सड़क हादसे में नंदलाल ने अपनी दोनों आंखों की रोशनी खो दी थी, लेकिन उन्होंने जिंदगी से हार नहीं मानी।
दुर्घटना के बाद से उनके पिता छगनलाल सुथार, पत्नी रेखा देवी, तीन बेटियां और एक बेटा उदयलाल उनकी देखभाल कर रहे हैं। सरकार की ओर से उन्हें विकलांग पेंशन मिल रही है, लेकिन नंदलाल का कहना है कि “अगर प्रशासन अन्य योजनाओं का लाभ भी दिला दे, तो जीवन थोड़ा आसान हो जाए।”
उन्होंने बताया कि इलाज के लिए भीलवाड़ा, उदयपुर, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद और नीमच जैसे शहरों के अस्पतालों में प्रयास किए, लेकिन आंखों की रोशनी वापस नहीं लौटी।
फिर भी, नंदलाल ने हार नहीं मानी। आज वे लकड़ी के सहारे और कदमों की गिनती से पूरे गांव में घूम लेते हैं। वे बाजार से घर तक की दूरी गिनकर तय करते हैं और गांव के लगभग 90 प्रतिशत लोगों को केवल आवाज़ से पहचान लेते हैं।
“मन में जोश और जज़्बा हो तो कोई काम असंभव नहीं,” — नंदलाल सुथार
नंदलाल घर पर छोटे-छोटे काम खुद करते हैं और दूसरों की मदद भी करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उनका यह हौसला और आत्मविश्वास पूरे गांव के लिए प्रेरणा है।
अब गांव के लोग उम्मीद कर रहे हैं कि प्रशासन जल्द ही इस जज़्बे वाले व्यक्ति को सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ दिलाएगा।















































