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शारदीय नवरात्र का पांचवा दिन : माँ स्कंदमाता की पूजा, विशेष महत्व और विधि-विधान
लोक टुडे न्यूज नेटवर्क -रितु मेहरा
जयपुर।शारदीय नवरात्र का पांचवा दिन माँ दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप की आराधना को समर्पित है। माँ स्कंदमाता, भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की जननी मानी जाती हैं और उन्हें शांति, शक्ति और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।
कौन हैं माँ स्कंदमाता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माँ स्कंदमाता शेर पर विराजमान रहती हैं और गोद में बालरूप कार्तिकेय को धारण करती हैं। इनके चार भुजाएं हैं – दो भुजाओं में कमल का पुष्प, एक भुजा से भगवान स्कंद को थामे हुए और चौथी भुजा से भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। इन्हें कमलासन भी कहा जाता है, क्योंकि ये कमल के पुष्प पर विराजमान होती हैं।
माँ स्कंदमाता का प्रसिद्ध मंदिर
भारत में माँ स्कंदमाता का प्रमुख मंदिर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित नग्गर गांव में है। यहाँ हर साल नवरात्रों में देशभर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा कई शक्ति पीठों पर भी पांचवें नवरात्र में विशेष आयोजन होते हैं।
पूजा विधि और प्रसाद
पांचवें नवरात्र की पूजा में सबसे पहले घर या मंदिर में माँ स्कंदमाता की प्रतिमा/चित्र को स्थापित कर गंगाजल से शुद्धिकरण किया जाता है।
पीले या नारंगी वस्त्र पहनकर पूजा करना शुभ माना जाता है।
देवी को पीले फूल, खासकर गेंदे के फूल अर्पित किए जाते हैं।
प्रसाद के रूप में केले और घी मिश्रित हलवा विशेष रूप से चढ़ाया जाता है।
दीपक जलाकर दुर्गा सप्तशती के पांचवें अध्याय का पाठ करने से विशेष लाभ मिलता है।
पूजा का महत्व और लाभ
माँ स्कंदमाता की पूजा करने से ज्ञान, वैराग्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
विशेष मान्यता है कि माँ स्कंदमाता की कृपा से संतान की प्राप्ति और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
मानसिक शांति और स्थिरता भी इसी दिन की पूजा से प्राप्त होती है।
नवरात्रि का सामाजिक और धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में नवरात्रि को देवी शक्ति की उपासना का सबसे बड़ा पर्व माना गया है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि समाज को एकता और संयम का संदेश भी देता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में लोग व्रत-उपवास रखते हैं, गरबा और डांडिया जैसे सांस्कृतिक आयोजन करते हैं और घर-घर में माता रानी की महिमा का गुणगान होता है।
नवरात्र केवल देवी पूजन का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्म-शुद्धि, संयम और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने का उत्सव है, जो जीवन में धर्म, अध्यात्म और संस्कारों को गहराई से स्थापित करता है।
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