लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
गंगापुर (भीलवाड़ा)। आस्था और विश्वास का प्रतीक मानी जाने वाली भरका माता आज सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि व्यापारिक जगत में भी घर-घर तक पहचानी जाती हैं। भरका माता को आइसक्रीम और पाव भाजी व्यापारियों की “इष्ट देवी” कहा जाता है। प्रदेश ही नहीं, बल्कि गुजरात, मुंबई और दक्षिण भारत तक गंगापुर व सहाड़ा क्षेत्र के सैकड़ों लोग भरका माता के नाम से व्यापार संचालित कर परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। जिस प्रकार सांवरिया सेठ के नाम से व्यापार चलता है, उसी प्रकार भरका माता का नाम भी देशभर में व्यापारिक पहचान बन चुका है।
ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
भीलवाड़ा जिले के गंगापुर उपखंड के भरक ग्राम पंचायत में स्थित भरका माता मंदिर को मेवाड़ क्षेत्र का प्रमुख शक्तिपीठ माना जाता है। मान्यता है कि हजारों वर्ष पूर्व राजा भर्तहरि ने यहां कठोर तपस्या कर माता की मूर्ति की स्थापना की थी। मंदिर परिसर पहाड़ी पर बसा है और इसे लेकर अनेक पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं।
भरक गांव का नाम भी माता भरका के नाम पर पड़ा। कभी इस पहाड़ी की गुफाओं में शेर रहा करते थे। वहीं, पहाड़ी के नीचे बसे ठठेरा परिवारों की बर्तन बनाने की आवाजें चारों ओर गूंजा करती थीं। हर वर्ष यहां माता का भंडारा आयोजित होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
गोशाला और सेवा कार्य
मंदिर परिसर के निकट स्थित गोशाला में सैकड़ों गोवंश की सेवा की जाती है। भरकादेवी विकास समिति मंदिर के विकास कार्यों में लगातार सहयोग कर रही है।
आधुनिक सुविधाएं और पहुंच
पहले श्रद्धालुओं को माता के दर्शन के लिए 763 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती थीं। लेकिन कुछ वर्ष पूर्व विधायक कैलाश त्रिवेदी के प्रयासों से यहां तक पक्की सड़क बनाई गई, जिससे अब वाहन सीधे मंदिर के निकट तक पहुंच सकते हैं। पहाड़ी को काटकर बनी इस सड़क से श्रद्धालुओं की यात्रा सहज हो गई है। खास बात यह है कि मंदिर का दरबार करीब 15 किलोमीटर दूर से ही दिखाई देता है।
संगमरमर से निर्मित धाम
विशेष संगमरमर से बने इस भव्य मंदिर में सालभर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। भरका माता से लाखों लोगों की आस्था जुड़ी हुई है और यहां का धार्मिक माहौल हर आगंतुक को भक्ति और विश्वास से भर देता है।















































